सहजहिं सूच्छम अलक छुटि, परी पलक पर आइ।
खँजन मीन मनु ग्रहन कौ, विधु दई पासि चलाइ॥१५॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
केश राशि से विलग हुई एक सूक्ष्म लट स्वाभाविक गति से पलक पर आ पड़ी है, लगता है चन्द्रमा ने खञ्जन और मीन को पकड़ने के लिये कोई फन्दा फेका हो