अति सुढ़ार सुठि सुमिलि बनी, मनिमय जेहरि चारु।
चलनि छबीली भाँति पर, मत्त मरालनि वारु॥३५॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
सुन्दर जेहरि सुढार मणियों से जटित होकर अलङ्कृत हैं श्री प्रिया जू के श्रीचरणों की मदमन्थर गति पर मत्त राजहंस न्यौछावर हैं