कुंज रसोई रचि दियौ, चौका सेज बनाइ।
अति दृढ़ चौकी प्रेम की, तापर बैठे आइ॥८४॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
पाकशाला रूपी निभृत-निकुञ्ज में चौका रूपी शय्या की रचना हुई । सुदृढ़ प्रेम की चौकी बिछी जिस पर रसिक युगल विराजमान् हुए