॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 15.84

मणि-शृङ्गार

कुंज रसोई रचि दियौ, चौका सेज बनाइ।
अति दृढ़ चौकी प्रेम की, तापर बैठे आइ॥८४॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

पाकशाला रूपी निभृत-निकुञ्ज में चौका रूपी शय्या की रचना हुई । सुदृढ़ प्रेम की चौकी बिछी जिस पर रसिक युगल विराजमान्‌ हुए