॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 16.2

हित-शृङ्गार

फूर्ली फूलनि की लता, रहीं जमुन-जल झूमि।
तैसिय अद्भुत झलमलै, कंचन-मनि-मय भूमि॥२॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

अनेक कुसुमिति लताएँ यमुना-जल में प्रतिबिम्बित होती हैं, वैसे ही वन की कञ्चनमणिमय भूमि अद्भुत भाँति से झलमलाती रहती है