फूर्ली फूलनि की लता, रहीं जमुन-जल झूमि।
तैसिय अद्भुत झलमलै, कंचन-मनि-मय भूमि॥२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
अनेक कुसुमिति लताएँ यमुना-जल में प्रतिबिम्बित होती हैं, वैसे ही वन की कञ्चनमणिमय भूमि अद्भुत भाँति से झलमलाती रहती है