श्री राधा सुधा निधि — श्लोक 10
यत्पादपद्मनखचन्द्रमणिच्छटायाः
विस्फूर्जितं किमपि गोपवधूष्वदर्शि।
पूर्णानुरागरससागरसारमूर्त्तिः
सा राधिका मयि कदापि कृपां करोतु ॥10॥
अर्थ / व्याख्या
जिनके चरण कमल के नखरूपी चन्द्रमणि की छटा का कुछ अनिर्वचनीय विलास गोपियों में देखा गया है, वे पूर्ण अनुराग रस के सागर की सार स्वरूप मूर्ति श्रीराधिका मुझ पर भी कभी कृपा करें।