श्री राधा सुधा निधि — श्लोक 113
कदा सुमणि किङ्किणी वलय नूपुर प्रोल्लसन्
महामधुर मण्डलाद्भुत विलास रासोत्सवे।
अपि प्रणयिनो बृहद्भुज गृहीत कण्ठ्यो वयं
परं निज रसेश्वरी चरण लक्ष्म वीक्षामहे ॥113॥
अर्थ / व्याख्या
सुन्दर मणि जटित किंकिणी, कंकण और नूपुरों से सुशोभित महामधुर मण्डल में हो रहे अद्भुत विलास वाले रासोत्सव में प्रियतम (श्रीश्यामसुन्दर) की विशाल भुजाओं द्वारा आलिंगित कण्ठों वाली (होने पर) भी हम केवल अपनी रसमयी स्वामिनी के चरण चिह्नों को कब देखेंगी ?