श्री राधा सुधा निधि — श्लोक 126
कालिन्दी कूलकल्पद्रुमतल निलय प्रोल्लसत्केलिकन्दा
वृन्दाटव्यां सदैव प्रकटतर रहो वल्लवी भाव भव्या।
भक्तानां हृत्सरोजे मधुर रससुधास्यंदि पादारविन्दा
सान्द्रानन्दा कृतिर्नः स्फुरतु नव नव प्रेमलक्ष्मीरमन्दा ॥126॥
अर्थ / व्याख्या
श्रीयमुना जी के तट पर कल्पवृक्ष के नीचे स्थित निवास स्थल में श्रेष्ठ रूप से उल्लसित हो रही क्रीड़ाओं की मूल रूपा, श्रीवृन्दावन में सदा ही प्रकट रहने वाले एकान्त गोपियों (ललिता विशाखा आदि) के भाव से (प्रेम से) गौरवान्वित बनी हुई, भक्तों के हृदय कमल में मधुर रसामृत को स्त्रवित करने वाले चरण-कमलों वाली, सघन आनन्द की मूर्ति (ऐसी) कभी मन्द न पड़ने वाली नित्य नवीन प्रेमलक्ष्मी (प्रेम की शोभा श्रीराधा) हमारे (मन में) प्रकाशित हों।