श्री राधा सुधा निधि — श्लोक 175
किं ब्रूमोन्यत्र कुण्ठीकृतकजनपदे धाम्न्यपि श्रीविकुण्ठे
राधा माधुर्य वेत्ता मधुपतिरथ तन्माधुरीं वेत्ति राधा।
वृन्दारण्य स्थलीयं परम रस सुधा माधुरीणां धुरीणा
तद्वन्द्वं स्वादनीयं सकलमपि ददौ राधिकाकिंकरीभ्यः ॥175॥
अर्थ / व्याख्या
(जबकि) श्रीवैकुण्ठ-धाम भी कुण्ठित (मन्द) प्रदेश बन गया है तब अन्यत्र का तो कहना ही क्या! (क्योंकि) श्रीराधा के माधुर्य को मधुपति श्रीकृष्ण जानते हैं और श्रीकृष्ण के माधुर्य को श्रीराधा जानती हैं। (किन्तु) परम रसामृत माधुर्य में सबसे अग्रणी इस श्रीवृन्दावन भूमि ने उस आस्वादन के योग्य (रस स्वरूप) युगल को सम्पूर्ण रूप से श्रीराधा किंकरीगण (दासियों) को प्रदान कर दिया है।