श्री राधा सुधा निधि — श्लोक 192
कदा वा प्रोद्दाम स्मर समर संरम्भरभस
प्ररूढ़ स्वेदाम्भः प्लुत लुलित चित्राखिलतनू।
गतौ कुञ्ज द्वारे सुखमरुति संवीज्य परया
मुदाहं श्रीराधा रसिक तिलकौ स्यां सुकृतिनी ॥192॥
अर्थ / व्याख्या
जहाँ सुखदायक पवन बह रहा है, (ऐसे) कुंज द्वार पर आकर खड़े हुए, उत्कट सुरत-संग्राम के वेग से उत्पन्न स्वेद सलिल (पसीना) से भीगे हुए शिथिल और विचित्र शरीर वाले, श्रीराधा और रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण को परम प्रसन्नता से पंखा झलकर मैं कब पुण्यशालिनी बनूँगी।