श्री राधा सुधा निधि — श्लोक 212
सान्द्रानन्दोन्मद रसघन प्रेम पीयूष मूर्तेः
श्रीराधाया अथ मधुपतेः सुप्तयोः कुञ्जतल्पे।
कुर्वाणाहं मृदु मृदु पदाम्भोज सम्वाहनानि
शय्यान्ते किं किमपि पतिता प्राप्त तन्द्राभवेयम् ॥212॥
अर्थ / व्याख्या
सघन आनन्द और उन्मत्त बना देने वाले रस से युक्त सघन प्रेमामृत की मूर्ति, कुंज शैया पर शयन करते हुए श्रीराधा और माधव के चरण कमलों को अत्यन्त कोमलता पूर्वक सम्वाहन (दबाती हुई) करती हुई मैं शैया के निकट ही क्या कुछ-कुछ लुढक जाऊँगी और ऊँघने लगूँगी ?