श्री राधा सुधा निधि — श्लोक 225
यूनोर्वीक्ष्य दरत्रपा नटकला मादीक्षयन्ती दृशोर्
वृन्वाना चकितेन संचितमहा रत्नस्तनं चाप्युरः।
सा काचिद् वृषभानुवेश्मनि सखी मालासु बालावली
मौलिः खेलति विश्व मोहन महा सारुप्यमाचिन्वती ॥225॥
अर्थ / व्याख्या
युवक-युवतियों की भय एवं लज्जा से युक्त नट जैसी कलाओं को देखकर अपने नेत्रों को (कटाक्ष-पात आदि की) दीक्षा देती हुई, महारत्नों के कोष रूपी श्रीअंग युगल वाले वक्षस्थल को चकित भाव से ढँकती हुई, संसार को मोहित करने वाले श्रीश्यामसुन्दर के साथ पूर्ण समानता का संग्रह करती हुई (रूप और गुण में पूर्णतया उनके समान होने की इच्छा अपने मन में रखती हुई) किशोरियों की शिरोमणि कोई अनिर्वचनीया (श्रीराधा) श्रीवृषभानु-गृह में सखियों के मध्य क्रीड़ा कर रही हैं।