श्री राधा सुधा निधि — श्लोक 235
दूरे सृष्ट्यादिवार्त्ता न कलयति मनाङ्नारदादीन्स्वभक्ता-
ञ्छ्रीदामाद्यैः सुहृद्भिर्न मिलति हरति स्नेह वृद्धिं स्वपित्रोः।
किन्तु प्रेमैकसीमां मधुर रससुधासिन्धु सारैरगाधां
श्रीराधामेव जानन्मधुपतिरनिशं कुंजवीथीमुपास्ते ॥235॥
अर्थ / व्याख्या
सृष्टि-रचना आदि की बात तो दूर रही, अपने नारद आदि भक्तों को भी नहीं पहिचानते, श्रीदामा आदि मित्रों से नहीं मिलते तथा अपने माता-पिता के स्नेह को भी बढ़ावा नहीं देते, किन्तु प्रेम की परमावधि स्वरूपा तथा मधुर रस रूपी अमृत-सिन्धु के सार की अगाध आश्रय एकमात्र श्रीराधा को ही जानते हुए मधुपति (श्रीश्यामसुन्दर) निरन्तर कुंज गलियों की उपासना करते रहते हैं।