॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री राधा सुधा निधि — श्लोक 48

वीणां करे मधुमतीं मधुर स्वरांता
माधाय नागर शिरोमणि भावलीलाम्।
गायन्त्यहो दिनमपारमिवाश्रुवर्षै-
र्दुःखान्नयन्त्यहह सा हृदि मेऽस्तु राधा ॥48॥

अर्थ / व्याख्या

अहो! मधुर स्वरों वाली उस मधुमती नाम की वीणा को हाथ में लेकर नागर शिरोमणि श्रीश्यामसुन्दर की भाव पूर्ण लीलाओं का गान करती हुई (एवं) अहह, अपार जैसे (किसी प्रकार न कटने वाले) दिन को अनुवर्षा के साथ दुःख पूर्वक व्यतीत करती हुई श्रीराधा मेरे हृदय में (स्फुरित) हों।

नोट – (इस श्लोक में श्रीराधा की तीव्र विरह स्थिति का वर्णन है। यह प्रसिद्ध है कि श्रीहिताचार्य श्रीश्यामाश्याम के नित्य संयोग के उपासक हैं, फिर इस श्लोक की रचना में उनका क्या प्रयोजन हो सकता है?

श्रीराधासुधानिधि के समग्र अध्ययन से प्रतीत होता है कि इसमें श्रीहिताचार्य ने अपने भाव के अनुकूल ही श्रीराधा के स्वरूप का चित्रण किया है। किन्तु श्रीराधा के चरणों में श्रीहितमहाप्रभु की ऐसी प्रगाढ़ रति है कि विभिन्न रसिक महानुभावों द्वारा अनुमोदित श्रीराधा के विभिन्न भाव-स्वरूप उनके हृदय में समय-समय पर संचरित होते रहते हैं। इसको हम श्रीहिताचार्य के हृदय में रही हुई श्रीराधा नाम के प्रति अनन्य निष्ठा का ही परिणाम मानते हैं अन्यथा ‘विच्छेदाभास मानादहह निमिषतो’ (श्लोक संख्या 173) आदि नित्य संयोग का कथन करने वाले श्लोकों की संगति बैठाना सम्भव नहीं होगा और श्रीमद् राधासुधानिधि में इस प्रकार के नित्य संयोग का वर्णन करने वाले श्लोक ही संख्या में बहुत अधिक हैं।)