॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री राधा सुधा निधि — श्लोक 54

अतिस्नेहादुच्चैरपि च हरिनामानि गृणत-
स्तथा सौगन्धाद्यैर्बहुभिरुपचारैश्च यजतः।
परानन्दं वृन्दावनमनुचरन्तं च दधतो
मनो मे राधायाः पदमृदुल पद्मे निवसतु ॥54॥

अर्थ / व्याख्या

(श्रीराधा चरण-कमलों के प्रति अपने मन में सर्वोपरि आसक्ति की कामना करते हुये कहते हैं कि) अत्यन्त स्नेह से तथा ऊँचे स्वर से श्रीहरि के नाम का उच्चारण करते हुए भी तथा सुगन्धित तिलक चन्दन आदि बहु प्रकार की सामग्रियों से उनका पूजन करते हुए भी एवं वृन्दावन में विचरण करते हुए उन परमानन्द स्वरूप का ध्यान करते हुए भी मेरा मन श्रीराधा के कोमल चरण कमलों में निवास करता रहे।