श्री राधा सुधा निधि — श्लोक 69
प्रेमानन्दरसैक वारिधि महा कल्लोलमालाकुला
व्यालोलारुण लोचनाञ्चल चमत्कारेण संचिन्वती।
किञ्चित् केलिकला महोत्सवमहो वृन्दाटवी मन्दिरे
नन्दत्यद्भुत काम वैभवमयी राधा जगन्मोहिनी ॥69॥
अर्थ / व्याख्या
एकमात्र प्रेमानन्द रस के सागर की महा तरंगों से आकुल (बनी हुई), अतिशय चञ्चल और अरुण नेत्रांचल के चमत्कार से किसी अनिर्वचनीय केलि-कलाओं के महोत्सव की वृद्धि करती हुई, अद्भुत प्रेम वैभव से परिपूर्ण, जगन्मोहिनी श्रीराधा श्रीवृन्दावन निकुंज मन्दिर में आनन्दित हो रही हैं।