श्री राधा सुधा निधि — श्लोक 6
तन्नः प्रतिक्षण चमत्कृत चारुलीला-
लावण्य मोहनमहा मधुराङ्गभङ्गि।
राधाननं हि मधुराङ्ग कलानिधान-
माविर्भविष्यति कदा रससिन्धुसारम् ॥6॥
अर्थ / व्याख्या
जिस मुख कमल से महामोहन माधुरी के (हावभाव आदि के) विविध अंगों की भंगिमायुक्त सुन्दर लीलाओं का लावण्य प्रतिक्षण चमत्कारपूर्ण बनता रहता है, माधुर्य के अंगों की कला (चातुर्य) का उत्पत्ति स्थान एवं रससिन्धु का सार रूप वह श्रीराधा-मुख हमारे सन्मुख कब प्रकट होगा?