॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

श्री हित सेवक वाणी — पद 9.सोरठा 9

श्रीहित अकृपा-कृपा प्रकरण — कृपा सोरठा

तृपित न मानत नैंन, कुंजरन्ध्र अवलोकि तन।
यह सुखकहत बनैं न, यह जु कृपा हरिवंश की॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — श्रीहित पथ-प्रदर्शनी टीका)

युगल किशोर के ऐकान्तिक विहार को कुज्ज-रन्भ्रों (छिद्रों) से अवलोकन करते रहने पर भी मेरे नेत्र तृप्ति नहीं मानते। यह सुख कुळ कहते नहीं बनता [इस दिव्य सुख में सराबोर करा देना] यह श्रीहरिवंशचन्द्र की कृपा है।