तृपित न मानत नैंन, कुंजरन्ध्र अवलोकि तन।
यह सुखकहत बनैं न, यह जु कृपा हरिवंश की॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — श्रीहित पथ-प्रदर्शनी टीका)
युगल किशोर के ऐकान्तिक विहार को कुज्ज-रन्भ्रों (छिद्रों) से अवलोकन करते रहने पर भी मेरे नेत्र तृप्ति नहीं मानते। यह सुख कुळ कहते नहीं बनता [इस दिव्य सुख में सराबोर करा देना] यह श्रीहरिवंशचन्द्र की कृपा है।