॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित सेवक वाणी — पद 1.12

श्रीहित जस विलास प्रकरण

अब अवतार भेद तिन कहे। सकल उपासक तिन मन रहे॥
कहे भक्ति साधन सबै॥
मथुरा नित्य कृष्ण कौ वास। निशि-दिन श्याम न छाँड़त पास।
तासु सकल लीला कही॥
कही सबनि की एकै रीति। श्रवन-कथन सुमिरन परतीति।
बीति काल सब जाइयौ॥
उपज्यौ सबनि सुदृढ़ विश्वास। जस वरनौं हरिवंश विलास
श्रीहरिवंशहि गाइ हौं॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — श्रीहित पथ-प्रदर्शनी टीका)

(पहले सामान्य भगवद्धक्ति का उपदेश करके) अब (विशेष रूप से) भगवदावतारों का भेद उन (अवतार उपासकों ) के प्रति कहा (जो जिन अबतारों के प्रति प्रीति एवं निष्ठावान्‌ थे।) उस उपदेश को सुनकर उन उपासकों ने अपनी-अपनी इष्ट-निष्ठा दृढ़ की। इन्हें भी भक्ति के (वे ही) साधन बताये, (जो नवधा-भक्ति के क्रम में हैं।) (समस्त अवतारों के बीज श्रीकृष्ण-अवतार का निरूपण करते हुए आपने बताया कि) श्रीकृष्ण नित्य-निरन्तर मधुरा में निवास करते हैं। ये मधुरा-वासी श्यामसुन्दर मथुरा का सामीप्य (निवास) कभी छोड्ते ही नहीं। इनकी समस्त लीलाओं का भी वर्णन आपने 'किया। (उपासना-साधना क्रम में भगवदावतार, भगवत्तत्व, एवं मथुरा वासी श्रीकृष्ण) सभी भक्तों के लिये विश्वास पूर्वक गुण-लीला श्रवण, कथन, स्मरण आदि यही साधन एक ही रीति से आपने 'बताया। (और यह भी कहा कि) इस प्रकार नवधा भक्ति करते-करते ही (जीवन का) सारा समय व्यतीत होना चाहिये। श्रीसेबक जी कहते हैं कि आपकी इन बातों पर सबका सुदृढ विश्वास उत्पन्न हो गया, मैं ऐसे हरिवंश चन्द्र का यश विलास वर्णन और गुण-गान करता हँ. और करूँगा। स्वामी श्रीहितदास जी महाराज ८९

टिप्पणी: समस्त अवतारों के निधान (बीज) श्रीकृष्ण हैं। उनका मथुरा वासी स्वरूप अन्य अवतारो से परे और हान्‌ है किन्तु उनकी प्राप्ति में भी उन्हीं साधनों का उपयोग है, जो अन्य भगवद्‌ रूपों और अवतारों में है अर्थात्‌ ये सब केवल उसी नवधा भक्ति से ही सिद्ध-प्राप्त होने वाले स्वरूप हैं। अब (मधुरा वासी श्रीकृष्ण से परे) ब्रज-बिहारी श्रीनन्दनन्दन के स्वरूप, प्रभाव लीला का लक्ष्य कराते हुये कहते हैं- मूल- अब जु कही सब ब्रज की रीति, जैसी सबनि नंद-सुत प्रीति। कीर्ति सकल जग विस्तरी॥ 'बाल-चरित्र प्रेम की नींव, 'कहत सुनत सब सुख व्ही संवा जीवन ब्ज-वासिनु सफलं॥ ब्रज की रीति सु अगम अपार, 'चिस्तरि कही सकल संसारा