श्रीहरिवंश नित्य वर-केलि। बाढ़त सरस प्रेम-रस बेलि॥
मेलि कण्ठ भुज खेलहीं॥
बनितन-गन मन अधिक सिरात।निरखि-निरखि लोचन न अघात
गात गौर-साँवल बने॥
जूथ- जूथ जुवतिनु के घने। मध्य किशोर-किशोरी बने॥
गनैंकौंनरति अति बढ़ी॥
नित-नित लीला, नित-नित रास। सुनहु रसिक हरिवंश विलास।
श्रीहरिवंशहि गाइहौं॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — श्रीहित पथ-प्रदर्शनी टीका)
श्रीहरिवंश की यह श्रेष्ठ एवं नित्य रस-केलि (नित्य विहार क्रीड़ा) प्रतिक्षण सरस हे एवं इसमें प्रेम रस रूपी लता नित्य वर्धमान रहती है। (इस विहार में दोनों प्रिया-प्रियतम) गल बहियाँ दिये सदा क्रीड्ा-परायण रहते हैं, जिनका दर्शन कर सहचरि-गणों का मन अधिकाधिक शीतल होता रहता है। वे देखती ही रहती हैं, इस विहार को, किन्तु देखते हुए भी उनके नेत्र अतृप्त बने रहते हैं। (नृत्य क्रीड़ा के समय की छटा भी बडी आपूर्व है।) गौर-श्याम-तनु युगल किशोर भली प्रकार सुशोभित हैं और सब सहचरियों के मध्य में शोभा पा रहे हैं। युवती-गणों के अनेकानेक यूथ हैं। उस रास में अत्यधिक बढ़ी प्रीति का वर्णन कौन कर सकता है? श्री सेवक जी कहते हैं- हे रसिकॉ ! सुनो, मैं श्रीहरिवंश विलास का जो वर्णन करूँगा, उसमें सदा-सदा ऐसा ही रास और सदा-सदा ऐसी ही लीलाएँ हैं अत: मैं ऐसे ही रसमय श्रीहरिवंश का ही गान करूँगा
टिप्पणी: “नित्य वर केलि" रसिकचार्य ्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद ने जिस वृन्दावन-विहार रस केलि का इस विश्व में प्रकाश किया है, बह अवतारनाद से परे, विलक्षण एवं अगोचर है। वह नित्य है, अनादि है, और अनन्त है। उसका सूक्ष्म परिचय इतना ही है कि नित्य-धाम वृन्दावन में नित्य किशोर श्री राधावल्लभ लाल अपनी नित्य सहचरियों के साथ नित्य रास-विलास ही किया करते हैं। यह रस केलि विश्व प्रपञ्च से सुदूर है, सृष्टि-पालन एवं प्रलय की छाया माया उसका स्पर्श भी नहीं कर 'पाती। और तो क्या सृष्टि पालन प्रलय के प्रधान कर्त्ता-पुरुष ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी उस नित्य-विहार से अपरिचित हैं। इस ' नित्य-वर केलि' में अवतारों के भी बीज, अवतारी श्री राधावल्लभलाल नित्य रसमयी क्रीडाऐ करते और रास-विलास का ही सुख लिया करते हैं। सूल- (२) जलता भवन सुख शीतल छहाँ, श्रीहरिवंश रहत नित जहाँ। तहाँ न चैभव आन की॥ जब-जब होत धर्म को हानि, तब-तब तनु धरि प्रगटत आनि। जानि और दूजौ नहीं॥ जो रस रीति सबनि तें दूरि, सो सब विश्व रही भरपूरि। मूरि सजीवनि कहि दई॥ स्वामी श्रीहितदास जी महाराज २७