एक गुरुन्न सौं वाद करंत, जु पंडित मानी ह्वै जीभहि ऐंठत।
एक दरव्य के जोर बरब्बट, आसन चाँपि सभा मधि बैठत॥
एक जु फेरि रीति उपदेशत, एक बड़े ह्वै न बात प्रमानत।
काचे धरम्मिन के सुनों छन्द, धरम्मी धरम्म मरम्म न जानत॥
एक गुरुन्न सौं वाद करंत, जु पंडित मानी ह्वै जीभहि ऐंठत।
एक दरव्य के जोर बरब्बट, आसन चाँपि सभा मधि बैठत॥
एक जु फेरि रीति उपदेशत, एक बड़े ह्वै न बात प्रमानत।
काचे धरम्मिन के सुनों छन्द, धरम्मी धरम्म मरम्म न जानत॥