प्रथमहिं सेवहु गुरु के चरन। जिन यह धर्म कह्यौ सब करन॥
नाम-प्रताप बताइयौ॥
जो हरिवंश नाम अनुसरहु। निशिदिन गुरु कौ सेवन करहु॥
सकल समर्पन प्राण-धन॥
गुरु-सेवा तजि करहिं जे बानि। यहै अधर्म, यहै सब हानि॥
कानि न रसिकन में रहै॥
गुरु-गोविन्द न भेद कराइ। संतत सकल सुनहु चित लाइ॥
श्रीहरिवंश प्रताप जस॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — श्रीहित पथ-प्रदर्शनी टीका)
(इस प्रकार पूर्व कथित रीति से) सर्व प्रथम श्रीगुरु चरणों का सेबन करो जिन्होंने इस (हित) धर्म के पालन करने के लिये आज्ञा दी और जिन्होंने नाग्म का प्रताप बताया है। यदि तुम वास्तव में श्रीहरिवंश नाम 'का अनुसरष्ण (आश्रय) कर रहे हो तो तुम्हें चाहिये कि अपने प्राण, धन और सर्वस्व के समर्पण पूर्वक दिन रात श्रीगुरुदेव का ही सेबन करो। जो लोग श्री गुरू-सेवा को छोड़कर अन्य साधनों में मन लगाते हैं, यही उनका अधर्म और बड़ी भारी हानि है। ऐसे हठशील अधर्मी की रसिकों में कोई प्रतिष्ठा या मर्यादा मान नहीं रह पाता। अतएव सच्चे उपासक का धर्म है कि वह श्री गुरुदेव एवं गोविन्द में कोई भेद न देखे न करे। र श्रीहितदास जी महाराज १२५ श्रीसेवक जी कहते हैं-- रसिको ! आप निरन्तर चित्त लगाकर श्रीहरिवंश का प्रताप-यश सुनिये।
टिप्पणी: (१) प्रथम जु सेवहु गुरु के चरन'' सर्वप्रथम सर्व भावेन श्री गुरुदेव के ही चरणों के सेवन करने और उनके प्रति निष्ठा दृढ़ करने का यह अभिप्राय है कि इन्हीं श्रीगुरुदेव की कृपा से जीव की रति श्रीहित चरणों में हुई है अत: यही सर्व प्रथम सेव्य हैं। अनादिकालीन भव-प्रस्त जीव को भगवान् की ओर लगा देने का ही उनका उपकार अनन्त है अत: वे प्रथम और अनन्त काल तक सेवनीय हैं। (२) “गुरु गोविन्द न भेद कराइ'' वास्तव में भगवान् और गुरु में कोई भेद तो है ही नहीं, श्रुति कहती है- ““यस्य देवे पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।'' अर्थात् “जिसकी भगवान् में पराभक्ति है और जैसी भगवान् में है चैरी ही गुरू में है, तो वही मोक्ष का अधिकारी है। इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव के प्रति श्रीमद्धागवत एकादश स्कन्ध में कह रहे हैं-- “आचार्य मां विजानीयात्।'! अर्थात् “आचार्य (गुरु) रूप में मुझे ही जानो।'' महात्मा कबीर तो शास्त्र से भी ऊपर उठकर कह गये। उन्होंने गुरुदेव का पद गोविन्द से बड़ा दिखा दिया- गुरु गोविन्द दोऊ खड़े , काके लागूं. पाये। 'बलिहारी इन गुरुन व्ही, गोविन्द दिया लखाय॥ ठीक तो है, गोविन्द को मिला देने वाले गुरुदेव ही तो हैं, अतः वही गोविन्द से पूर्व वन्दनीय हैं। ऐसा ही कुछ गुरु-तत्व के विषय में नाभाजी ने कहा है- भक्ति, भक्त, भगवंत, गुरु चतुर नाम वपु एका इनके पद बंदन किये मैंटत विघ्न अनेक॥ पुनः साधन-शैली का ही निर्देश करते हैं- मूल- गुरु-उपदेश सुनहु सब धर्म, श्रीहरिवंश-चाम फल-मर्म। भर्म भग्यौ बचननि सुनत॥ सुक मुख-वचन जु श्रवन सुनावहु, तब श्रीहरिवंश सु नाम कहावहु। मन सुमिरन बिसरै नहीं॥ हरि, गुरु, चरन, सेवा अनुसरहु, अर्चन-बंदन संतत करहु। दासंतनि करि सुख लहौ॥ सख्य समर्पण भक्ति बढाइ, संतत सकल सुनहु चित लाइ। श्री हरिवंश प्रताप जस आवार्थ- श्रीगुरुदेव के उपदेश से सम्पूर्ण धर्म का श्रवण करो, जिसका मर्म अर्थात् रहस्य श्रीहरिवंश नाम ही है। श्रीगुरु के प्रकाशमय वचनों को सुनते ही तुम्हारा भ्रमरूपी अज्ञान-अन्धकार भाग जायगा स्वामी श्रीहितदास जी महाराज १२७ 'पहले जब श्रीशुकदेव जी के श्रीमुख-वचन ( श्रीमद्भागवत पुराण) तुम्हारे द्वारा सुने जायेंगे, तब तुम्हें (सारासार विवेक होकर) श्रीहरिबंश नाम में निष्ठा होगी - तुम उस नाम को कह सकोगे। (यदि इस प्रकार क्रम से तुम चल सके तो फिर तुम्हारा) मन (उन श्रीहरिवंश के) स्मरण को कभी भूलेगा ही नहीं। फिर भी तुम साथ-साथ श्रीहरि (राधावल्लभ लाल) और श्रीगुरु के चरणों की सेवा का अनुसरण ही करना, निरन्तर उनके प्रति अर्चन और वन्दन करते रहना एवं उनकी सेवा आदि करके दास्य सुख प्राप्त करना। पश्चात् नवधा क्रम से सख्य और अन्तिम आत्म-समर्पण पूर्वक सेवन करने से भक्ति अभिवृद्धि को प्राप्त होती है। श्रोहरिवंश प्रताप-यश की प्राप्ति का यही पथ है, उसे सब लोग चित्त लगाकर सुनिये। “सुक मुख वचन जु श्रवन सुनाबहु।'' श्रीमद्धागवत पुराण ही शुकदेव जी का श्रीमुख वाक्य है। इसमें आद्यन्त एक भगवतत्त्व का ही निरूपण है। इसके श्रवण एवं मनन से साधक के चित्त में वैराग्य ज्ञान के साथ-साथ स्व एवं पर (आश्रय तत्व श्रीकृष्ण) तत्व का बोध हो जाता है। भागवत शब्द का अर्थ ही है- भगवान् के रूप की समझ। जिसे भगवान् के स्वरूप की ठीक-ठीक जानकारी हो गयी, वही उनके प्रति अनन्य प्रेम कर सकेगा और बही गोविन्द और गुरु के अभेद तत्व को समझ सकेगा, अत: स्पष्ट है कि “' शुक मुख बचन'' का सच्चा श्रोता ही श्रीहरिवंश नाम का अधिकारी है। और जो श्रोहरिबंश नाम का अधिकारी है, वह उनकी सम्पत्ति नित्य विहार का भी अधिकारी है। इसी क्रम को ध्यान में रखते हुये रसिकों ने कहा है- प्रथम सुने भागौत भक्त मुख भगवत बानी। द्वितीय अराधै इष्ट व्यास नौं भाँति बखानी॥ तृतीय करै गुरु दक्ष परम सर्वज्ञ रसीलौ। चौथे होइ विरक्त बसै बनराज जसीलौ॥ पाँचै बिसरै देह सुखि तब छठें भावना रास की। सातें पावै रीति रस श्रीस्वामी हरिदास की॥ = श्रीभगवत रसिक जी मूल- (५) गुरु-उपदेश चलहू, एहिं चाल, ऐसी भक्ति करै बहु काला