गुरु-उपदेश चलहु यह चाल। ऐसी भक्ति करहु बहु काल॥
ये नव लक्षण भक्ति के॥
यह हरि-भक्ति करै जब कोई। तब हरिवंश नाम रति होइ
यह जु बहुत हरिकीकृपा॥
हरि-हरिवंश भेद नहिं करै। श्रीहरिवंश नाम उच्चरै॥
छिन-छिन प्रति बिसरै नहीं॥
प्रीति सहित यह नाम कहाइ। संतत सकल सुनहु चित लाइ॥
श्रीहरिवंश प्रताप जस॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — श्रीहित पथ-प्रदर्शनी टीका)
श्रीगुरुदेव द्वारा उपदेश की गयी पद्धति का अनुसरण करते हुए बहुत काल तक भक्ति करता रहे। यदि कोई ऐसी नवधा भक्ति करता रहेगा, तो अवश्य उसकी श्रीहरिबंश नाम में निष्ठा हो जायगी, यह श्रीहरि व य स्वामी श्रीहितदास जी महाराज १२९ की बहुत बडी कृपा है। साधक को चाहिये कि वह हरि और हरिवंश में भेद बुद्धि न करके प्रतिक्षण हरिवंश नाम का ही उच्चारण करता रहे; इसका विस्मरण न करे- इसे भूले नहीं वरं प्रीति पूर्वक इस नाम को लिया ही करे। रसिको ! श्रीहरिवंश का यह प्रताप यश चित्त लगाकर सुनो।
टिप्पणी: “ये नौ लच्छन भक्ति के'' श्रीमद्धागवत में भक्ति के नौ लक्षण इस प्रकार कहे गये हैं- श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः स्मरणं पाद सेवनम्। अर्चनं चन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥ (७.२३) अर्थात् भगवान् की भक्ति के नौ भेद हैं- श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चा, वन्दना, दास्य (सेवा), सख्य और सर्वात्म समर्पण। मूल- (६) गुरु-उषदेश चलहू एहि रीति, श्रीहरिबंश-नाम-पद-प्रीति। प्रेम मूल यह नाम है॥ प्रेमी रसिक जपत यह नाम, प्रेष मगन निजु बन विश्रामा श्री हरिबंश जहाँ रहै॥ प्रेम प्रवाह परै जन सोइ, व