गुरु-उपदेश चलहु एहि रीति। श्रीहरिवंश-नाम-पद-प्रीति॥
प्रेम-मूल यह नाम है॥
प्रेमी रसिक जपत यह नाम। प्रेम मगन निज वन विश्राम॥
श्रीहरिवंश जहाँ रहैं॥
प्रेम-प्रवाह परै जन सोइ। तब क्यौं लोक-वेद-सुधि होइ॥
जब श्रीहरिवंश कृपा करी॥
व्रत-संयम तब कौन कराइ। संतत सकल सुनहु चित लाइ॥
श्रीहरिवंश प्रताप जस॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — श्रीहित पथ-प्रदर्शनी टीका)
यदि श्रीगुरुदेव के उपदेश के अनुसार इस (ऊपर कही गयी नवधा-भक्ति एवं हरिवंश नाम-स्मरण की ) रीति से चलोगे तो श्रीहरिवंश नाम और चरणों में प्रीति हो जायगी, क्योंकि यह (हरिवंश) नाम प्रेम 'का उद्गम स्थल है। प्रेमी रसिक जन इस नाम को जपते हैं और इस नाम के प्रताप से प्रेम मग्न हुए श्रोहरिवंश के निज-वन ( ऐकान्तिक केलि भूमि श्रीवृन्दावन) में अचल विश्राम पा रहे हैं जहाँ निरन्तर श्रीहरिबंश रहते हैं। इस नाम का जापक जब प्रेम के प्रवाह में पड़ जायगा तो भला उसे लोक एवं वेद की मर्यादाओं की सुधि कैसे हो सकती है? जबकि उस पर स्वयं प्रेम रूप श्रीहरिवंश ने कृपा की है, तब व्रत और संयम कौन कर सकता है? (अर्थात् प्रेमी तो केवल अपने प्रभु के रूप में तल्लीन हो जाता है, उसे फिर बाहय आचारों और मर्यादाओं की खबर तक नहीं रह जाती।) हे रसिको! यह है श्रीहरिवंश का प्रताप-यश, आप चित्त देकर इसका श्रवण करें।
टिप्पणी: “प्रेम प्रवाह परै जन सोइ , तब क्यों लोक-वेद-सुधि होइ।'' प्रेम प्रवाह में पडे हुए प्रेमी की दशा का एक चित्र महात्मा श्रीसुन्दरदास जी ने क्या ही अच्छा चित्रित किया है। वह लोक और बेद से कितने ऊपर उठ गया है? पाठक देखें- स्वामी श्रीहितदास जी महाराज प्रेम लग्यौ परमेसुर सौं तब भूलि गयौ सिगरौ घर वारा। ज्यौं उन्मत्त फिरे जित ही तित नैंकु रही न सरीर सँभारा॥ स्वाँस उसाँस उठे सब रौंम चलै दुग नीर अखंडित धारा। सुंदर कौन करै नवधा विधि छाकि रहयौ रस पी मतवारा॥ न लाज तीन लोक की, न वेद को कहयौ करै। न संक भूत प्रेत की, न देव यच्छ तैं डरै॥ सुनै न कान और को, द्रसै न और इच्छना। कहै न मुक्ख और बात, सुभक्ति प्रेम लच्छना॥ जो साधक श्रीहरिवंश नाम के प्रताप और जाप से प्रेम प्रवाह में फँस गया, उसके बाह्य लक्षणों का वर्णन सात और आठ दो छन्दों में क्रमशः करते हैं- जूल जब यह नाम इदै आइ है, तब सब सुख-संपति पाइ है। श्रीहरिबंश सुजस कहै॥ अरु अपनी प्रभुता नहिं सहै, तून ते नीच अपनपौ कहै। सुभ अरु असुभ न जानही॥ समुझै नहीं कछू व्लुल-कर्म, सूधौ चले आपने धमी रसिकनि सौं प्रीतम कहै॥ कबहुँ. काल वृथा नहिं जाइ, संतत सकल सुनहु चित ल्ाइ। श्री हरिबंश प्रताप जसा