नित श्रीहरिवंश सु नाम कहैं। नित राधिका-श्याम प्रसन्न रहैं।
नित साधन और नहीं तिनकैं। सुख सम्पति दम्पति जू जिनकैं
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — श्रीहित पथ-प्रदर्शनी टीका)
जो नित्य निरन्तर * श्रीहरिवंश' यही सुन्दर नाम कहता रहता है उस पर श्रीराधिका एवं श्रीश्यामसुन्दर भी नित्य प्रसन्न रहते हैं। जिसके लिये सुख सम्पत्ति दम्पति जू सर्वस्व हैं, फिर उनके लिये और-और साधनों कौ क्या आवश्यकता है? अर्थात् उनके लिए तो और साधनां का महत्व ही नहीं है। मूल- (दब) जब राधिका स्याम प्रसन्न भये। तब नित्य समीप सु खैंचि लये॥ हरिबंश समीप सदा तिनकैँ। सुख संपत्ति दंपति जू जिनकें॥ भावार्थ- जब [ श्रीहरिवंश-कृपा से] श्रीराधा एवं श्रीश्याम प्रसन्न हुए तो उन्होंने [उस कृपापात्र अधिकारी जीव को] अपने समीप सदा के लिये खींच लिया, जहाँ पर श्रीहरिवंश श्रीयुगल किशोर के समीप नित्य विराजते हैं, फिर तो ऐसे कृपापात्र के लिये सुख की सम्पत्ति श्रीयुगलकिशोर श्रीराधावल्लभलाल तो उनके अपने ही हैं। भुल (१५) नित नित श्रीहरिवंश-नाम, छिन-छिन जु रटत नरा