श्री हित यमुनाष्टक — श्लोक 5
वहंतिकां श्रियां हरेर्मुदा कृपा स्वरूपिणीं-
विशुद्ध भक्तिमुज्ज्वलां परे रसात्मिकां विदुः
सुधा श्रुतित्वलौकिकीं परेश वर्ण रूपिणीं-
भजे कलिन्द नन्दिनीं दुरंत मोह भंजनीम् ॥5॥
अर्थ / व्याख्या
व्याख्या: जो श्रीहरि की श्याम कांति का मोद पूर्वक वहन करती हैं, जो साक्षात् कृपा स्वरूपिणी हैं, जो परम रसमयी उज्ज्वल एवं विशुद्ध भक्ति स्वरूपा हैं, जो अमृत की अलौकिक धारा स्वरूप हैं, जिनका वर्ण परम प्रभु श्रीकृष्ण के श्याम रंग के समान है एवं जो दुरन्त मोह को नष्ट करने वाली हैं, मैं उन कलिन्दनन्दिनी श्रीयमुनाजी का भजन करता हूँ।