॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित यमुनाष्टक — श्लोक 8

समस्त वेद मस्तकैरगम्य वैभवां सदा-
महा मुनीन्द्र नारदादिभिः सदैव भाविताम् ।
अतुल्य पामरैरपि श्रितां पुमर्थ शारदां-
भजे कलिन्द नन्दिनीं दुरंत मोह भंजनीम् ॥8॥

अर्थ / व्याख्या

व्याख्या: जिनका वैभव समस्त उपनिषदों के लिए अगम्य है, नारदादिक महा मुनीन्द्र जिनका ध्यान करते हैं, आपका आश्रय लेने वाले सर्वश्रेष्ट पामरों को भी जो प्रेम प्रदान करती हैं एवं जो दुरन्त मोह को नष्ट करने वाली हैं, मैं उन कलिन्दनन्दिनी श्रीयमुनाजी का भजन करता हूँ।