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श्री विट्ठल विपुल देव जी का पावन चरित्र / कैसे प्रकट हुए श्री बाँके बिहारी लाल जू !

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पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से भक्त-चरित्र — पूरी कथा ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

परम पूज्य प्रात स्मरणीय रसिक शेखर श्री विट्ठल विपुल देव जी महाराज की गुरु निष्ठा के अद्वितीय प्रतिमान थे आपका जन्म संवत 1532 की अघन शुक्ल पंचमी को राजपुर वृंदावन में हुआ स्वामी जी के प्रथम शिष्य होने का गौरव प्राप्त करने वाले श्री विट्ठल विपुल जी स्वामी हरिदास जी के प्रति संपूर्णता समर्पित थे वे स्वामी हरिदास जी से वय में पाच वर्ष बड़े और उनके ममेरे भाई थे वे अपने गुरु के अनुग सहचर थे 30 वर्ष की आयु में गृह त्याग करने वाले विट्ठल विपुल देव जी ने 70 वर्षों तक वृंदावन वास किया आपका वैराग्य परम उत्कट एवं रस रीति प्रगा एवं भाव सिद्ध थी आपका विरोध था रस सागर उनके लिए गुरु ही नित्य जोरी थे जिनका वियोग सह सकना संभव नहीं था श्री विट्ठल विपुल जी स्वामी श्री हरिदास जी महाराज के प्रथम शिष्य उनके लौकिक वृत संबंधी सामग्री का भाव होने पर भी इतना निश्चित है कि आप स्वामी जी के समकालीन थे एवं स्वामी जी के निकुंज प्रवेश के थोड़े ही दिनों बाद तक आप संसार में विद्यमान रहे निज मत सिद्धांत के अनुसार आप स्वामी

जी के ममेरे भाई एवं उनसे आयु में पाच वर्ष बड़े थे गृहस्थ वर्ग के गो स्वामियों की मान्यता अनुसार आप स्वामी जी के भातु पुत्र थे आप की गणना परम उच्च कोटि के रक्तो एवं रसियो में की जाती है रस उपासना एवं वाणी रचना के आधार पर आपको रस सागर कहा जाता है पूज्य श्री रसिक शिरोमणि विट्ठल विपुल देव जी महाराज उनकी महिमा का क्या वर्णन किया जा सकता है जो स्वयं ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी के हर समय स्वामी जी की परिचर्या में थे स्वामी जी वैराग्य और अनुराग दरों की चरम सीमा में पहुंचे हुए महापुरुष स्वयं ललिता ज ही हैं आठो पहर स्वामी जी के मुखारविंद का दर्शन स्वामी जी के श्री मुख से निकली हुई प्रिया प्रीतम की रसमय लीलाएं और स्वामी जी की परिचर्या यही श्री विट्ठल विपुल देव जी का जीवन था ऐसे स्वामी जी में पूर्ण जीवन समर्पण करना यह गुरु भक्ति का एक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण भी है आठो पहर अपने गुरुमुख चंद्र के चकोर बने हुए निरंतर उनकी परिचर्या में हम इन बाहरी बातों को ज्यादा स्मरण नहीं करते कि वह शरीर संबंधी

मामा के लड़के थे कि भाई के लड़के थे इन बातों का रस क्षेत्र में कोई भी स्थान नहीं है आचार्य गुरु स्वरूप श्री स्वामी हरिदास जी ललिता जी के अवतार है और उनके शिष्य इससे बड़ी और कोई महिमा नहीं उनके परिवार के क्या है इससे कोई लेना हमें नहीं हमें यह समझना है कि स्वामी जी के अनन्य और स्वामी जी के बाद उस रस का जो उत्तराधिकार वो श्री विट्ठल विपुल देव जी महाराज पर स्वामी जी के अंतर ध्यान होने के बाद ज्यादा जीवन ही नहीं धारण किया श्री विट्ठल विपुल देव जी महाराज ने यह जो आज हम बिहारी जी का दर्शन पा रहे हैं विट्ठल विपुल देव जी की कृपा से पा रहे हैं एक दिन श्री विट्ठल विपुल देव जी ने देखा कि स्वामी श्री हरिदास जी निधिवन के एक निश्चिंत एकांतिक स्थल पर बैठ कर के लता कुंज की तरफ जहां सघन लताए थी बस देखते रहते कभी-कभी मुस्कुराते कभी प्रेम उन्मत हो जाते स्वामी जी महाराज स्वामी श्री हरिदास जी बहुत समय ऐसा करके फिर प्रणाम करते और वहां से चल देते यह नित्य की दिनचर्या थी श्री विट्ठल विपुल देव जी बड़े विस्मित

हुए कि इधर क्या है जो रोज स्वामी जी प्रणाम करते हैं रोज भाव दशा को प्राप्त होते हैं बहुत देर तक एकटक इस लता कुंज की तरफ देखते रहते हैं तो विनम्रता पूर्वक श्री स्वामी जी महाराज से विट्ठल विपुल देव जी ने पूछा स्वामी जी हमें तो इधर केवल लता ही दिखाई देती है और आप नित्य प्रति इधर बहुत देर बैठते हैं इधर देखते रहते हैं मुस्कुराते रहते फिर प्रणाम करते हैं फिर चल देते हैं तो स्वामी जी ने कृ करी और दिव्य दृष्टि प्रदान करी श्री विट्ठल विपुल देव जी महाराज को और कहा देखो इस लता भवन की तरफ तो जेही दृष्टि पात किया तेही देखा दिव्य रंग महल उस रंग महल में श्री प्रिया प्रीतम जू विराजमान है एक प्राण दो देही श्यामा श्याम ऐसे मिले हुए जैसे कनक लता तमाल से अरु हो ऐसे रंग महल में प्रिया प्रीतम को देखा श्री विट्ठल विपुल देव जी ने स्वामी जी की कृपा से जो दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई यह दिव्य दर्शन प्राप्त जही विट्ठल विपुल देव जी की हुए तो देखा स्वामी जी आनंद मगन है और उस समय स्वामी जी य पद गायन कर रहे थे माइरी सहज

जोरी प्रगट भ जो रंग की गौर श्याम घन दामिनी जैसे प्रथम ह हुती अब ह आगे ह रही है नट है तैसे मायरी सहज जोरी प्रगट भई जो रंग की गौर श्याम घन दा मि जैसे अंग अंग की उजरा सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंज बिहारी सम बैस बैसे फिर स्वामी जी महाराज ने विट्ठल विपुल देव जी को ऐसा ना लगे कि कोई आश्चर्य चकित केवल दृश्य हमने देखा कहा जाओ रंग महल से अंदर से झारी उठा के लाओ तो रंग महल में गए और प्रिया प्रीतम के समीप जो जल झारी थी दर्शन करते तो वहां कोई ऐसा नहीं था कि वह कोई दृश्य देखा साक्षात रंगमहल साक्षात प्रिया प्रीतम और जल झारी उठाकर लाए श्री स्वामी जी महाराज बड़े करुणामय है श्री विट्ठल विपुल देव जी ने स्वामी जी की तरफ देखकर नेत्रों में आंसू भर कर के कहा कि स्वामी जी आपकी कृपा से हमने सुख तो प्राप्त किया पर जगत के जन साधारण कैसे इनको देख पाएंगे आप कृपा करो स्वामी जी इस जगत पर कृपा करो विट्ठल विपुल देव जी ने जब करुणा भाव में भरकर स्वामी जी से कहा तो स्वामी जी ने प्रिया

प्रीतम जी से प्रार्थना करी कि आप जगत मंगल के लिए एकरूप होकर के श्री विग्रह रूप धारण करें श्री प्रिया प्रीतम जी की कमनीय कांति जो युगल सरकार रंग महल में विराजमान थे स्वामी जी विट्ठल विपुल देव जी और शिष्यों के देखते देखते ही त्रिभुवन मोहन मदन मोहन स्मन मनमोहन श्री बांके बिहारी के रूप में प्रिया प्रीतम हो गए बोलो श्री बांके बिहारी लाल की जय श्री प्रिया प्रीतम जू देखते देखते बांके बिहारी लाल के रूप में यह बांके बिहारी लाल कौन है साक्षात प्रिया प्रीतम

का रूप श्री विट्ठल विपुल देव जी अत्यंत मोहित हो गए और स्वामी जी के चरणों में गिरे बड़े करुणा में प्रभु आपने इस संसार के लिए अपार करुणा कर दी बिहारी जी के एक बार जिसने दर्शन किए कभी नरक नहीं जाएगा ध्यान रखना य साक्षात प्रिया प्रीतम जो विराजमान है स्वामी जी महाराज आप तो भक्त वां छा कल्पतरु है आपने बड़ी कृपा की विट्ठल विपुल देव जी दौड़ के गए और बांके बिहारी जी को गोद में उठाया फूल जैसे हल्के हुए बांके बिहारी गोद में उठाकर लाए और स्वामी जी के सामने गोद में लेकर बैठ गए स्वामी जी महाराज उस समय पद रचना करके यह पद गाया ऐसे देखत रहो जन्म सुफल करी मानो जन्म सुफल करी मानो प्यारे की भावती भावती के प्यारे जुगल किशोर ही जानो छिन नटर पल होनत लाड़ले प्यारे छिन नट पल होनत उत रहो एक ही तानो श्री हरिदास की स्वामी श्यामा कुंज बिहारी मन रानो अगहन शुक्ल पंचमी श्री बाके बिहारी जो महाराज प्रकट हुए उस तिथि से पाठ उत्सव मनाया जाता है अघन शुक्ल पंचमी को यह लीला घटित हुई जिस दिन से श्री बाके बिहारी जो महाराज प्रकट

हुए श्री स्वामी हरिदास जी का ऐसा सौरव अत्यंत ही शीघ्र दिशाओं दिशाओं में फैल गया और हजारों हजारों की भीड़ बांके बिहारी य के दर्शन कर ले तब से अब तक कृतार्थ कर रहे श्री बांके बिहारी जी महाराज ये श्री विट्ठल विपुल देव जी की अपार करुणा का है जो स्वामी जी से प्रार्थना करके प्रिया प्रीतम को बिहारी जी के रूप में आज हम लोगों को प्रदान किया श्री विट्ठल विपुल देव जी महाराज स्वामी जी के बड़े अनन्य और आसक्त चि स्वामी श्री हरिदास जू के दास नाम विठल है गुरु के

वियोग दाह उपजो अपार है रास के समाज में विराज सब भक्त राज बोली के पठाई आए आज्ञा बड़ो भार है युगल स्वरूप अवलोक नाना नृत्य भेद गान तान कान सुनी रही ना संभार है मिली गए वाही ठोर पायो भाव तन और क रस सागर सो ता को यो विचार है श्री स्वामी जी महाराज के अनन्य और प्रथम प्रथम शिष्य श्री विट्ठल विपुल देव जी महाराज बहुत समय तक स्वामी जी की सेवा में रहे स्वामी जी ने अंतर्धान की लीला की जय देखा कि हमारे गुरु जी हमारे नेत्रों से अंतरध्यान हो गए उसी समय कई परत के

कपड़े की मोटी पट्टी आंखों में बांध ली जिन आंखों ने स्वामी जी को देखा है अब किसी और को नहीं देखेंगे आंखों में पट्टी बांध ली श्री विट्ठल विपुल देव जी ने और अन्न जल का परित्याग कर दिया सात दिन सात रात्रि हो गई ना जल ना अन्न आंखों में पट्टी बांधे एकांत में बैठे श्री हरिदास श्री हरिदास बस शु प्रवाह अविरल चल रहा है पूरे रसिक समाज में वैसे ही स्वामी जी के अंतरध्यान होने से बड़ी विकल होता थी जब ये सुना कि विट्ठल विपुल देव जी को सात दिन हो गए कुछ खाना पीना नहीं आंखों में पट्टी बांधे बस रो रहे हैं वृंदावन के रसिक समाज में जो व्याकुलता हुई उसमें एक विधान रचा गया कि रासलीला का आयोजन हो और रास लीला के आयोजन में जो प्रिया प्रीतम थे तो प्यारी ज से कहा विट्ठल विपुल देव जी को जब यहां लाया जाएगा तो आप हाथ पकड़ लेना और ठाकुर जी से कहा गया कि आप सर पर हाथ रखकर कहना कि आप प्रियाज के के हमारे दर्शन करो फिर प्रिया जू पट्टी खोल देंगी फिर प्रियाज उनको कुछ उच्छिष्ट पवांगे तो जीवन रह जाएगा रास लीला प्रारंभ हो

गई तो रसिक शिरोमणि श्री हरिराम व्यास जी को भेजा गया कि आप गुरुजनों में हो श्री विट्ठल विपुल देव जी को लिवा लाने के लिए क्योंकि आपकी आज्ञा वो टा लेंगे नहीं यद्यपि बिल्कुल एकांत सेवन किसी से ना मिलना इसीलिए हरिराम व्यास जी को भेजा गया कि उनको मिलने दिया जाएगा उनकी आज्ञा नहीं उल्लंघन होगी आज्ञा बड़ो भार है बड़ों की आज्ञा का आदर करना यह रसियो का स्वभाव होता है अत हरिराम व्यास जी गए और कहा प्रिया प्रीतम याद कर रहे हैं रास लीला में आपको आपको चलना ही होगा बड़े रस कों की आज्ञा श्री विट्ठल विपुल देव जी रास लीला में आए पह प्रिया प्रीतम को सिखा दिया गया था रासलीला में आते ही श्री जी ने आकर विट्ठल विपुल देव जी के दोनों हाथ पकड़ लिए प्यार से और लाल जू मस्तक पर हाथ सलाते हुए कहा बाबा नेत्रों से पट्टी खोल और देख हम प्रिया प्रीतम को ठाकुर जी इतना कह रहे थे कि प्रिया जू ने जो पट्टी बंधी हुई थी विट्ठल विपुल देव जी की नेत्रों से खोल दी विट्ठल विपुल देव जी ने आख खोला देखा युगल सरकार तो कहा गुरुदेव श्री

स्वामी जी महाराज कहां है प्रिया प्रीतम तो स्वामी जी कहां है क्योंकि ललिता सखी का स्वरूप है तो प्रियाज ने कहा वह तो हमारी नित्य सहचर अपने स्वरूप में स्थित हो गई है अर्थात अंतर्धान हो गई बस करुणानिधि मम स्वामिनी तुम पकड़यो मम हाथ अब करुणा करी लाड़ली राखी आपने साथ य उच्चारण किया कि लाडली अब तो हाथ पकड़ लिया अब जहां स्वामिनी जो हमारी ललिता सखी है अब हम वही जाना चाहते हैं तत्काल हा हरिदास हा हरिदास बस ऐसा उच्चारण करते प्राण त्याग दिए अपने गुरुदेव के वियोग में हा स्वामी जी हा हरिदास ऐसा उच्चारण करते ही विट्ठल विपुल देव जी अपने सहचर वपु में स्थित हो गए इस शरीर का त्याग कर दिया समस्त रसिक समाज में हाहाकार मच गया अय वेदना प्रकट हो गई इसीलिए नाभा जी ने आपको बताया विठल विपुल रस सागर रस के समुद मुद्र श्री विट्ठल विपुल देव जी की गुरु निष्ठा अलौकिक है समस्त समाज आश्चर्य चकित हो गया शास्त्रों में जिस प्रकार गुरु से प्रेम करना चाहिए श्री गोविंद भगवान से भी अधिक श्री गुरुदेव जी को श्रेता प्रदान करनी

तुमते अधिक गुरुही जी जानी सकल भाय सेव समानी श्री विट्ठल विपुल दजी ने करके दिखा दिया कि प्रिया प्रीतम सामने हैं पर स्वामी जी कहां है गुरुदेव कहां है बोले वो तो अंतर ध्यान हो गए फिर मेरा जीना किस काम तत्काल प्राण त्याग दिए बलिहारी है ऐसी गुरु भक्ति की उनकी कुछ वाणी का गायन करके हम उनका प्रार्थना पूर्वक नमन पूर्वक वंदन करते हैं और यह विनय करते हैं कि जैसी उनकी गुरु भक्ति जैसी प्रिया प्रीतम में आ सक्ति उसका किनका हम सबको मिले पहला पद अपने लोग गाते हैं हमारे माई श्यामा जू को राज हमारे माई को श्यामा जू को राज श्यामा हमारे माई श्यामा जू को राज हमारे माई जा के अधीन सदा ई सावरो जाके या ब्रज को सिर ताज को सिरताज हमारे माई श्यामा जू कोरा श्री विपुल विट्ठल विपुल देव जी महाराज ी बिहारी ू अर्थात लाडली जू की अनन्य दासी हैं य अपनी सखी से कहती हे सखी माई का संबोधन होता सखी हमारे माई श्यामा जू को राज हे सखी हमारे इस प्रेम देश में नित्य बिहार श्री श्यामा जू का ही राज है यहां शासन चलता है श्यामा जू का

बाके बिहारी लाल भी श्यामा जू के अधीन है जाके अधीन सदा ई सावरो या ब्रज को सिरताज चाहे ब्रज लीला हो चाहे निकुंज लीला हो दोनों में जो सिरताज है श्री बांके बिहारी जू वह अपना ताज जहां रखते हैं व लाडली जू बिहारी जू बोले जा के अधीन रसगन मोहन मूर्ति विचित्र केली महोत्सव ल सितम राधा चरण लोत रुचिर स खंडम हरि मंदे हे सखी हमारे तो श्री श्यामा जू का राज है कौन सी श्यामा जू जिसके अधीन अखिल कोट ब्रह्मांड का स्वामी ब्रजराज निकुंज शवर जिनके अधीन है वह हमारी श्यामा जो उनका राज्य है कह रहे यह जोरी अविचल वृंदा नरी अवन नान आन सु काज न श्री विठ्ठल विपुल बिहारिन केवल विठल बिहारी के दिन जल धर ज गाज ज गाज हमारे माई श्यामा जू को राज हमारे यह जोरी अविचल वृंदावन एक कदम भी हमारे प्रिया प्रीतम वृंदावन से बाहर नहीं जाते वृंदावन परित्यज्य पादम कम न गच्छति तो हम सब रसिके हम सब प्रिया प्रीतम के उपासंपदा वन बिहारिणी की जोड़ी की रस माधुरी की उपासना स्वीकार कर ली जाए तो साधन साध्य सब कुछ हमारे श्यामा श्याम तो बोले यह

देखने को मिलेगा श्री विट्ठल विपुल देव जी कहते हैं मैं बिहारिणी दासी हूं श्यामा जू की दासी हूं मैं कह रही हूं कि इनके बल से देखने को मिलेगा जैसे नवीन मेघ जलधार में बिजली विराजमान ऐसे बिहारी जी के समीप विराजमान बिहारिणी जू ऐसे युगल सरकार का साक्षात्कार उसी को प्राप्त होता है जो अन्य सब साधन का त्याग करके श्यामा श्याम का अनन्य होकर केवल आठों पैर इन्हीं का तन इन्हीं की लीला गन इन्हीं की सेवा में और कुछ पद श्री विट्ठल विपुल देव जी के स्मरण करते हैं लालन तेरे ही आधीन लालन सुनरी सखी हो साची कहती हो सख हो सा तू जल है ये मीन तू जल है ये लालन तेरे ही आधीन लालन मान धारण किए हुए अपनी स्वामिनी बिहारी जू से सखी विट्ठल विपुल देव जी महाराज कह रहे मेरी अरे यह लाल जू बांके बिहारी जू एक मात्र आपके ही अधीन है मैं सत्य कह रही हूं सखी यह ऐसे अधीन है आप जल सदस्य है तो यह मछली सदस्य है जैसे जल के बिना मछली जी नहीं सकती ऐसे हे श्यामा जू आपसे एक क्षण अलग रहकर यह जी नहीं सकते जैसे हित जू महाराज ये अलि प्रिया बदन

अजर सट के अनत नजात एक पलक झपक के लिए भी यह आपसे अलग नहीं हो सकते लाडली जू तेरे ही रस बस श्याम सुंदर व रेही रस बस श्याम सुंदर जा चत है जो दीन है दीन लालन तेरे ही आधीन रे श्री विठ्ठल विपुल विनोद बिहारी होत मनावत लीन मना लीन लालन तेरे ही आधीन लालन हे प्रिया जू आपके प्रेम रूपी जल से ही ये जीवित है एक क्षण भी आपसे बिलग होने पर इनके प्राण छटपटा लगेंगे ये श्याम सुंदर व अत्यंत दीनता पूर्वक हर समय आपसे प्रेम की याचना करते र ते हैं लाडली जो आप दाता हो और यह याचक है यद्यपि प्रीतम का स्वभाव विपुल विहार में है पर इस समय आप मान धारण किए हो तो आपको मनाने में उनके तन मन प्राण विगलियो रहे हैं लाडली जो मैं भी मना रही हूं आप मान लीजिए यह लालन श्री लाल जो आपके ही आधीन है आप जल सदस्य हो और ये मछली सदस्य है आपके बिना एक पल भी यह जी नहीं सकते लाल करत तेरे गुणगान लाल करत ते गुण जो न पतिया ह शपथ नहीं मानती जो न पतिया ह स नहीं मानती तो चली सुनी अपने काने चली सुनी काने लाल करत तेरे गुण गाने लाल लाली जू आप विश्वास

कर लो आप मान धारण कियो आप चल के देख लो पास में ही लता भवन के नीचे बैठे वह शुभ प्रवाह करते हुए कैसे श्यामा जू श्यामा जू राधा जू राधा जू रट रहे हैं कैसे वो आपके गुणगान कर रहे हैं मेरी बात मान लो लाडली जू यदि आपको मेरी वाणी पर विश्वास ना हो तो वैसे तो मैं कसम नहीं खाता पर शपथ खाकर कहता हूं लाल जू आपके अधीन है और आपका नाम जप कर रहे हैं और आपका गुणगान कर रहे हैं अगर इतने पर भी आपको विश्वास ना हो रहा हो तो आप चलो चल के देख लो चल कर के उनके आंखों में अश्रु है वो राधा राधा राधा श्यामा श्यामा श्यामा ऐसा रट रहे हैं और आपके ही गुणों का गा कर रहे स्वयं स्वयं चलकर अपने श्रवण इद्री से सुन लीजिए कि कैसे आर्त नाद करते हुए आपको पुकारते हैं लाली जू आपको समझ में नहीं आ रहा कि लाल जू को कितनी पीड़ा हो रही कैसे समझ में आएगा जो तुम श्याम होह वे श्यामा जो तुम श्याम तो यह वे जाने श्री विठ्ठल विपुल विनोद बिहारी बहा सो बाद रूसन ठने ठने लाल करत तेरे गुणगान विट्ठल विपुल देव जी ने कहा कि प्रिया जू लाल जो आपके आधीन

है आपके गुणगान कर रहे हैं आपका नाम आर्थ भाव से पुकार रहे आप चलकर देख लो यदि विश्वास ना हो तो मैं कसम खाकर कहता हूं इतने पर भी जब प्रिया जू नहीं बोली तो कहा प्रिया जू सच्ची कह रहे हैं कुछ क्षण के लिए यदि आप बिहारी ज हो जाओ और थोड़ी देर के लिए बिहारी जो श्यामा हो जाए तो आपको पता चल जाए कि हालत क्या है बिहारी जी की हम समझा रहे शपथ पूर्वक क तो भी आप नहीं सुन रहे मैं मनाता हूं विधाता से कि थोड़ी देर के लिए आप बिहारी ज हो जाओ जो बिहारी ज की दशा हो रही ना आपके प्रेम में थोड़ी देर आप समझकर देख लोगी तब आप जानोगे कि कितनी पीड़ा लाल जू को हो रही आपके मान धारण करने पर हे लाडली जू जो तुम श्याम हो और वे श्यामा तब आपको पता चलेगा मान मनाने में कैसा लगता है मान धारण करने में कैसा लगता अगर बिहारी जी बन के आप मान मनाओ ना और व्याकुल हो ना तब आपको पता चलेगा तो यह वेदन जाले तो आपको पता चलेगा कि कितना बिहारी जी को वेदना हो रही है कष्ट हो रही व्याकुलता हो रही हे लाडली जू यदि आप श्याम सुंदर हो जाओ बिहारी ज हो

जाओ और फिर य अनुभूति करो तो मुझे ऐसा लगता है कि आप फिर कभी मान नहीं धारण करेंगे इसलिए आप वामत का मान का त्याग करके द्रवित होकर चलो और बिहारी बिहारी दोनों खेलो और हम आपकी सेवा करें आपको आशीष दे यही हमारे हृदय में उमंग है श्री विट्ठल विपुल देव जी प्यारी तेरे नैनन पर त्रण टूटत प्यारी परन कुंद कली पर भोरा कली पर भरा हित अमृत रस घूट त अमत रस प्यारी तेरे नैनन पर त्रण टूटत प्यारी तेरे ऐसा होता क्यों है प्यारी जू को प्यारी जू आपके नेत्रों का चमत्कार है आपके नेत्र ऐसे सुंदर है निछावर है सब कुछ श्वेत कुंद कली पर जैसे भ्रमर मत होकर रस पान करता है वैसे आपके नेत्रों में लाल जू के नेत्र रस पान कर रहे हैं अमृत रस घूंट रहे हैं और जब आप नेत्र ऐसे कर लेते हो तभी वह व्याकुल हो जाते हैं जब जब रुक पलक संपुट लट अति आतुर अकुला लंपट ल निवे स अंतर ते अलप कलप सत साहब कहार कहो इन बान विषेक है कहरी इत लागत उत फूटत श्री विठ्ठल विपुल विनोद बिहारि विठल विरी पि को सर बसु लुटत लूट प्यारी तेरे नैन नि पर त्रण टूटत प्यारी

तेरी नेत्रों की तो यह दशा है और आपके नेत्रों का जो कटाक्ष है ना भृकुटि काम को दंड नैन सर कजल रेख अनी हे प्रिया जू यह नेत्रों से जो बाण संचालन किया लाल जू के हृदय में लगा तो विकल कर दिया सच तो यह है कि प्रिया जू आपने अपने नेत्रों से ही प्रीतम का स व लूट लिया उनको अपने अधीन कर लिया अब प्रीतम के पास कुछ नहीं है जो कुछ है सब आपके पास है हे प्यारी जू आपके नेत्रों में बलिहारी जा रही हूं ये सारा चमत्कार आपके नेत्रों का है ऐसे नित्य बिहार रस के बहुत सुंदर सुंदर लीला भरे हुए बहुत सुंदर सुंदर प्यारी जू प्यारी जू के रूप रस रास से भरे हुए पदों का गायन किया श्री परम रसिक शिरोमणी स्वामी जी के परम कृपा पात्र पूज्य गुरुवर श्री विट्ठल विपुल देव जी से यही प्रार्थना है कि हम सब उनके बच्चे हैं उनके शरणागत हैं हमारे हृदय में भी श्यामा श्याम के प्रति थोड़ी सी अनन्य आ जाए थोड़ा सा उनके नाम में उनके धाम में उनके चरणों में उनकी लीला में उनकी सेवा में प्रीति हो जाए श्री विट्ठल विपुल देव जी महाराज की जय कुंज

बिहारी श्री हरि दस

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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