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संतों की पहचान करना सरल नहीं है! जानिए उनकी विभिन्न कोटियाँ।

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पूज्य महाराज जी का एक संक्षिप्त वचन — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

ब्रह्मलीन महापुरुषों को पहचाना नहीं जा सकता। बड़ा मुश्किल है। एक बार एक ट्रेन में एक संत भगवान ऐसे बैठे थे। अब उनके संतों से होते हैं भगत लोग होते हैं। हर शिष्य चाहता मेरे गुरु जी अच्छी वस्तु पहने। मेरे गुरु जी अच्छी गाड़ी में चले। मेरे गुरु जी जब मेरे पास इतना तो मेरे गुरु जी हैं। तो वो भाव रहता है ना। तो उसने सोने की चैन की घड़ी और सब व्यवस्था अटैची सब तो दो चार बैठे थे नए लोग। तो उन्होंने कहा बाबा जी एक बात पूछे बुरा तो नहीं मानोगे? बोले नहीं बोले हम में और तुम में अंतर क्या रहा?

हमारी घड़ी भी इतनी महंगी नहीं जितनी तुम्हारी घड़ी है तुम्हारी अटैची है तुम्हारा सब। ये हम में तुम में अंतर क्या रहा? कहा बेटा कौन सा स्टेशन आ रहा है? बोले अमुक बोले चाय पीना है। गए चाय पीने। बोले एक चाय और बनाओ और पूरे जितने रुपए मिले थे सब चाय वाले के सामने रख दिए। इतने में गाड़ी ने हारन दिया और घड़ी और सब वही खोल के रख दिए थे। उन्होंने कहा बाबा जी अब तो हम चाय नहीं पिएंगे क्योंकि गाड़ी बोले अब हम तो चाय पिएंगे इधर जाएंगे। बोले वो सब बोले किसी ने दिया था कोई उठा लेगा।

बोले बाबा जी हम तो ऐसे बोले हम में तुम में यही अंतर है। तुम छोड़ नहीं सकते और हम एक मिनट में छोड़ सकते हैं। तो संतों की बाहरी क्रियाओं से हम नहीं जान सकते। अब ये कि संत भी तो मनुष्य शरीर धारी है ना तो कुछ ना कुछ चेष्टाएं अलग-अलग होती। वो पूर्व में कितना भजन किए हैं। यहां बिना भजन के कुछ नहीं मिलता है। तो हमको प्रणाम। एक राजर्षि है, एक ब्रह्मर्षि है, एक है बिल्कुल अकिंचन फटे पुराने कपड़े पहने हुए भीख मांग के खाना, रात दिन भगवान में भजन में डूबे रहना।

तो संतों की कई कोटियां हैं। और एक है अवधूत कोटि के जिनको कोई परवाह नहीं। समाज की कोई परवाह नहीं। शास्त्र मर्यादा से ऊपर उठे हुए जब जो मनाया जैसी मस्ती उनकी अब उनको देखोगे तो या तो पागल कहोगे और या तो धर्म विरुद्ध कहोगे। तो हमको चाहिए कि हम अपनी स्थिति को बढ़ावे। देखो पर्वत में मस्तक मारने से पर्वत का कुछ नहीं बिगड़ता। अपना ही खोपड़ी फूट जाती है। यह संत अिक भगवान के जन है। अच्छा तीन गुणों का खेल चल रहा है। सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण। अब कोई सात्विक प्रवृत्ति का है तो आपको अच्छा लगेगा।

कोई राजसिक प्रवृत्ति का है, कोई तमोगुण प्रवृत्ति का है। लेकिन सब भगवान के जन है।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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