॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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क्या सचमुच बरसाना में हुआ था राधा जी का जन्म! रहस्य या इतिहास? | RadhaAshtami Special 2025

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रसिक वाणी की व्याख्या (हित वार्ता) — ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

कृष्ण जी और राधा जी एक हैं या दो अलग-अलग स्वरूप हैं? हरिवंश जी महाराज पहले पद में ही चतुराशी जी में कह रहे हैं। कहो कौन करे जल तरंगन न्यारे। जय श्री हित हरिवंश हंस हंसनी सावल गौर कहो कौन करे जल तरंगन न्यारे। जल और तरंग को अलग कौन कर सकता है? श्री जी का जन्म सच में हुआ था। वो तो अजन्मा है। यह तो लाल जी के हृदय से प्रकट उनकी प्रेम मूर्ति हैं। श्री हरिवंश महाराज जी हरिवंश महाप्रभु की रचनाओं में राधा अष्टमी का क्या स्वरूप बताया गया है? चलो वृषभान गोप के द्वार जन्म लियो मोहन हित श्यामा आनंद निधि सुकुमार।

आनंद की निधि जो सुकुमारी है उन्होंने जन्म लिया है मोहन के हित के कारण। राधा जी का जन्म सच में परेशानी में हुआ था या कुछ और? चाचा वृंदावन दास जी की रचना में कह रहे हैं गोकुल में लाल जी का रावल में प्रिया जी का घर पर रह के राधाष्टमी कैसे मनाई जाए देखो प्रिया जी को सबसे ज्यादा प्रिय है आपका प्रेम आपका भाव दूसरी चीज उन्हें प्रिय नहीं है श्री हरिवंश जय जय जैसे कि राधाष्टमी आने वाली है तो हितवार्ता पे काफी फ्रीक्वेंटली क्वेश्चंस रिसीव हो रहे थे राधाष्टमी कब है कैसे मनाएं तो जय उनमें से कुछ क्वेश्चन सेलेक्ट करके टीम ने उनको हम आपके सामने रखें पूछो जय पहला क्वेश्चन है श्री हरिवंश महाराज जी राधाष्टमी में साल में एक बार शयन आरती के बाद दोबारा दर्शन खुलते हैं।

यह सच में होता है या फिर ऐसी बातें बनाई जाती हैं? राधा अष्टमी से एक दिन पहले सप्तमी के दिन राधा वल्लभ लाल शन आरती के उपरांत के बाद में दर्शन देते हैं। वो वर्ष में एक ही दिन दर्शन होते हैं सप्तमी के दिन जो कि जिसमें कि ढणी ढणन राधावल्लभ लाल के सामने प्रिया जी के यशगान का वर्णन करती हैं और उनकी वंशावली का वर्णन करती हैं। ढाणी ढणन कहने में शब्द अब आपको समझ में नहीं आएगा। जैसे पहले राजाओं के टाइम में भाट लोग होते थे जो कि उनकी प्रशस्ति उनका यशोगान उनका गुणगान उनके पूर्वजों के बारे में वो सारी जानकारी देते थे।

उनकी वंशावली का गान कि यह किस कुल से हैं। यह सारी चीजें वो बताते थे। बहुत सुंदर तरीके से गान करके। वो भाट बोले जाते थे। लेकिन यहां हमारे यहां उनको ढाणी और ढाणिन बोले जाते हैं। यह प्रियाल का वर्णन करते हैं। उनकी लीलाओं का गान करते हैं। प्रिया जी की वंशावली का गान करते हैं। प्रिया जी की का यश सुनाते हैं। यह वर्ष में एक दिन उस दिन जरूर होते हैं। यह दर्शन राधा वल्लभ लाल के शनारती के बाद में खुलते हैं। इसमें राधा वल्लभ लाल वैसे तो रोज में शयन आरती के बाद में अपने शयन कक्ष में जाकर विश्राम करते हैं और सुबह मंगलामर पर ही दर्शन खोलते हैं।

लेकिन सप्तमी के दिन भादो शुक्ल पक्ष सप्तमी जो कि आपके 30 सितंबर को पड़ेगी उस दिन यह दर्शन होंगे और राधा वल्लभ लाल शैया कक्ष में ना जाने के बजाय आरती के बाद में वहीं सिंहासन पे उनके आरती में आपने दर्शन किए होंगे चिबुक बेसर ह पहुंची यह सब उतार दी जाती हैं। लेकिन उस दिन सप्तमी के दिन नई पहुंची धारण होंगी। चिबुक बेसर धारण करके ही दर्शन खुलते हैं। केला पंचपल्लव आपके बंदनवार यह सब लग के फिर दर्शन खुलेंगे और ढणी ढणन प्रिया जी राधा वल्लभ लाल के सामने प्रिया जी का यशोगान और उनकी वंशावली का वर्णन करेंगे।

फिर उसके बाद में दर्शन लगभग आधे घंटे लगभग दर्शन खुलते हैं। उसके बाद में नीचे चौक में प्रांगण में यह ढाणी ढाणा का नृत्य चलता है। जो कि पहले पूरी रात्रि जागरण बताया गया है। जागरण होता था। लेकिन अब सबके शरीरों में वह सामर्थ्य नहीं है पुराने लोगों की तरह कि रात्रि जग के फिर अगले दिन का पूरे 24 घंटे का उत्सव कर सकें। इसलिए वह कुछ समय उसका 12:30 और 1:00 बजे तक वो चलता है। फिर यह 12:30 और 1:00 बजे तक चलता है। यह दर्शन उनका नृत्य जागरण होता है। सब रसिक आनंदमय रहते हैं।

बहुत सुंदर दर्शन है वो। इनका नृत्य जो होता है इनके जो आपस में जो वचन होते हैं ढाणी और ढाणी इनके बड़े सुंदर हैं आकर्षक हैं। यह जो यह एक लोग कहते हैं कि अफवाह है कि ये ऐसा दर्शन नहीं होते। यह वर्ष में एक दिन सप्तमी के दिन दर्शन होते हैं। श्री हरिवंश महाराज जी राधाष्टमी पे नित्यायनी दर्शन होते हैं या दर्शन विधि कुछ और होती है? प्रिया जी का जन्मोत्सव है। दर्शन में एक तो सौंदर्य अपने आप निखर आता है। प्रिया जी के श्री अंग से राधा वल्लभ लाल के श्री अंग से और दूसरा श्रृंगार विशेष होता है।

राधा अष्टमी के दिन विशेष श्रृंगार होता है। बाहर जगमोन में धूप आरती होती है। श्रृंगार आरती होती है और राजभोग तक बाहर जगमोन में रहते हैं। बढ़िया सुंदर बंगला बनता है। मंदिर की विशेष सजावट होती है। कोशिश तो यह रहती है कि पुरानी परंपराओं से रहे। लेकिन आज कल मॉडर्न चीजें बहुत आ गई हैं। उनसे भी सजाया जाता है। पहले तो बंदनवार फूलों की लड़ियां और केला के खंभ उनसे सजावट होती थी। अब इनके संग में और चीजें भी जुड़ गई हैं और अद्भुत दर्शन होते हैं। दोनों समय राधा वल्लभ लाल बाहर आते हैं शाम के समय में भी और दिन में भी।

श्री हरिवंश महाराज जी राधाष्टमी के दिन आपकी क्या दिनचर्या रहती है? भैया यह मन शरीर सब उनके लिए है। इसमें थोड़ी सी चीज और जोड़ना चाहते हैं कि यहां पर जो राधावल्लभ मंदिर की जो परंपरा है उसमें अपर और सपरस यानी कि बिना किसी से स्पर्श किए हुए हो तो वह अपरस बोला जाता है। किसी से भी स्पर्श नहीं हो सकते। उसमें स्नान के बाद में रेशमी वस्त्र अगर सूती भी पहने हैं तो वह पहले एक दिन पहले निचोड़ के सुखा दिए जाएंगे। उनको कोई टच नहीं करेगा। स्नान के बाद में ही वह धारण किए जाते हैं।

स्पर्श किए जाते हैं। कोई स्पर्श नहीं करेगा। ऊंची जगह पे या अलग जगह पर सुखाए जाते हैं। और ना आप वाशरूम जा सकते हैं ना कहीं जा सकते हैं। वाशरूम अगर जाते हैं तो आपको स्नान करके दोबारा कपड़ा चेंज करके फिर आना पड़ेगा सेवा में। तो यहां की परंपरा बहुत कठिन है। पुरानी परंपराओं के हिसाब से चल रहे हैं। आज भी वही परंपरा चल रही है। आपने कई वीडियो में देखा होगा कि हम मंदिर जाते हैं तो लोग हटो हटो करते हैं। वो कारण यही है उसका कि कहीं स्पर्श ना हो जाए। फिर स्नान करना पड़ेगा और श्री जी की सेवा में बिना स्नान और बिना कपड़ा बदले नहीं जा सकते।

यह ज्यादातर गर्मियों में भी परेशान करता है और सर्दियों में भी ज्यादा परेशान करता है। आप वाशरूम भी नहीं जा सकते हैं। इसलिए हमारे यहां आप देखेंगे लगभग सभी को वाशरूम ना जाना, पानी ना पीना इसके कारण सबका बीपी हाई रहता है। कभी भी आप किसी का भी चेक कर लेंगे तो बीपी हमेशा हाई मिलेगा। यह एक उनकी कृपा है क्योंकि उनके हाई लेवल के संग में है तो हाई चीज रहती है। उससे परेशानी नहीं है। लेकिन डरा देते हैं लोग तो भाई जान तो निकुंजी उनकी सेवा में यहां कर रहे हैं वहां जाकर करेंगे।

तो डर नहीं है उस चीज का। लेकिन एक साधारण तरीके से बताने के लिए यह बात कह रहे हैं। अब जो दिनचर्या है सुबह स्नान के बाद में सीधे मंदिर पहुंचेंगे। उधर राधा वल्लभ लाल के पट खुलेंगे और फिर उनका शयन कक्ष में जाके उनको उठाया जाएगा। वो भी बड़े लाड़ प्यार से चरण सहला के चरण सेवा करके फिर उनको सिंहासन पर निज मंदिर में लाकर विराजमान करके वहां पे हाथ धुलाए जाएंगे। कुल्ला कराया जाता है। फिर मंगला भोग रखा जाएगा उनके लिए। मंगला भोग के बाद में फिर मंगला आरती की तैयारी होती है।

लेकिन राधा अष्टमी वाले दिन की आपने चर्चा करी है। यह तो नित्यानी का बताया इतना तो राधा अष्टमी वाले दिन यही चीज रहेगी लेकिन भोग विशेष रहेगा उस समय सतियाध उस समय कलश रखा जाएगा। बंधनवार और यह सब चीजें तो रहेंगी। मंगला में विशेष भोग रखा जाता है। समाज गायन 5:00 बजे सुबह शुरू हो जाता है मंदिर में। लेकिन जिस समय दाई का पद जो जन्म के नौ महीनाओं का वर्णन करते हैं उस पद में नौवें महीने का जब वर्णन आता है और जब जन्म का आता है उस समय बाहर टकोरा लगेगा। फिर पट खुलेंगे और फिर मंगला आरती होती है।

मंगल आरती के बाद में चिक गिरेगी। चिक के दर्शन होंगे और वह लगभग आधी घंटा दर्शन खुले रहते हैं। उसके बाद में निज मंदिर में ही अंदर स्नान होंगे और पंचामित्र से स्नान होंगे जिसके कि दर्शन नहीं होते। वो अंदर जो सखियां रहती हैं सेवा में वही स्नान कराती हैं और फिर उसके बाद में विशेष श्रृंगार होगा राधा वल्लभ लाल का और बाहर जगमोहन में वहां पे बढ़िया भव्य बंगला उनका बनेगा विराजमान होने के लिए और जब स्नान हो के बाद में श्रृंगार हो जाएगा फिर महाराज बाहर पधारेंगे और वहां पर उनका बहुत सुंदर तरीके से धूप आरती के दर्शन होंगे।

धूप आरती के बाद में फिर श्रृंगार भोग रखा जाता है। श्रृंगार भोग भी विशेष 56 प्रकार की चीजें छप्पन भोग ही मान लें आप वो रहता है। फिर श्रृंगार आरती होगी और श्रृंगार आरती के उपरांत दर्शन खुले रहेंगे और उसी बीच में हमारे जितने भी प्यारे ब्रजवासी जन हैं वह सब आते हैं मंदिर में और जो रसिक जन हैं जो उनकी सखियां हैं अपने हृदय के भाव लुटाती हैं। वो अब किस रूप में है वह नहीं कहा जा सकता भाव। कोई धन लुटाता है, कोई सिक्का लुटाता है, कोई नोट लुटाता है, कोई जेवर लुटाता है, कोई वस्त्र लुटाता है, कोई फल लुटा रहा है, कोई बर्तन लुटा रहा है, कोई टॉफी, बिस्कुट, खिलौने जिसको जो मन में आ रहा है वो लुटा रहे हैं।

और ब्रजवासी जन केवल एक ही शब्द राधा प्यारी ने जन्म लियो है। वृंदावन रानी ने जन्म लियो है, हरिवंश हृदय ने जन्म लियो है। यही कहते हुए उन सामानों को लूटते हैं। फिर इसके बाद में लगभग 1:00 बजे के बाद में 1:00 बजे तक यह चलेगा। 1:00 बजे के बाद में हम जो गोस्वामी जन है उनका ददी कांधा होता है। आपने मंदिर में एक टंकी देखी होगी चौक में है गिरिराज जी के बगल में। उस टंकी में लगभग 1000 किलो दूध और दही, केसर, हल्दी, चंदन ये सारी चीजें उसमें इत्र यह सारी चीजें घोली जाती हैं बाल्टियों से।

बिल्कुल पीला रंग हो जाता है उसका और वो आप दर्शन किए होंगे पुराने वीडियोस में और सब जगह कि राधा प्यारी ने जन्म लिया और हाथ पकड़ के नाच रहे हैं और खूब उछल रहे हैं सब गोस्वामी जन और बाल्टियों से उनके ऊपर वो डाला जाता है दूध दही और हल्दी का मिश्रण यह फिर राजभोग आएंगे उसी बीच में दिकंद जब चल रहा है गोस्वामियों का उसमें बीच-बीच में हरिवंश महाप्रभु की हरिराम व्यास जी की और रसिकों की बधाइयों का गान भी चलता रहेगा और फिर उसके बाद में राजभोग आएंगे और राजभोग आरती के बाद में हम लोग सब गोस्वामी जन राधा वल्लभ लाल के पुराने मंदिर जो आज हरिवंश जी का मंदिर बोला जाता है वहां जाकर ददी कांदा होगा इसी प्रकार वहां पर भी कुछ पद गाए जाएंगे बधाई के गाई जाएंगी उसके बाद में वनचंद्र महाप्रभु का डोल है जिसे छोटा रास मंडल बोला जाता है वहां वहां पर ददीिकांदा होगा।

उसके बाद में हम लोग सेवा कुंज जाएंगे सब जने। सेवा कुंज में ददीिकांदा होगा। सेवा कुंज के बाद में बड़े रास मंडल गोविंद घाट पे वहां पे पूर्ण विश्राम होगा ददीिका के संग में। फिर उसके बाद में लोग जिनकी जैसी सामर्थ्य है यमुना स्नान की घर पर स्नान की वो अपने स्नान करके शाम की तैयारी में क्योंकि शाम को भी दर्शन है दर्शन शाम को खुलेंगे राधा वल्लभ लाल के उसमें शाम को नया बंगला बनेगा उसमें विराजमान होकर दर्शन देते हैं धूप आरती संध्या आरती शन आरती तक वहीं रहते हैं और शाम को सवारी सवारी हमारे यहां की विशेष है राधा वल्लभ लाल की ऐसी अद्भुत सवारी शायद उत्तर भारत में नहीं निकलती है।

कई जगह वर्णन आया है कि उत्तर भारत की सबसे बड़ी सवारी होती है राधाष्टमी की। एक छोर मंदिर के बाहर बाजार में है और दूसरा बड़े रास मंडल तक जाती है सवारी तो बड़े रास मंडल पर आगे का छोर पहुंच जाता है। इतनी बड़ी सवारी रहती है वो और इस सवारी में पीछेछे बिहारी जी की भी सवारी उस दिन स्वामी हरिदास जी का भी जन्मोत्सव मनाया जाता है। प्राकट्य उत्सव उनका होता है। तो वहां पर उनकी सवारी भी पीछेछे रहती है। हरिराम व्यास का वो पद बड़ा सार्थक लगता है। उस समय सखी सहेली नीकी मिली है हरिवंशी हरिदासी हरिवंशी आगेआगे हरिवंशियों की सवारी और पीछे पीछे हरिदास जी की तो ऐसा हरिवंश जी और हरिदास जी एक संग मिलकर चल रहे हो ऐसा वातावरण रहता है।

बाजार में यह स्थिति रहती है जो हमारे ब्रजवासी जन दुकान वाले हैं वो वो बाजार वाले हैं। बाजार के अपने-अपने बाजार को बहुत सुंदर तरीके से सजाया जाता है। उनमें आपस में प्रतियोगिता चीज रहती है कि मेरा बाजार ज्यादा सुंदर सजा कि उनका सजा तो ये और जगह-जगह शरबत की प्याऊ पानी की प्याऊ ठंडे जल की जैसी जिसकी सामर्थ है वो सब लगाते हैं। वृंदावन का माहौल केवल एक ही शब्द सुनाई देता है। राधा प्यारी न जन्म लियो है। श्यामा प्यारी न जन्म लियो है। इसके अलावा इस वृंदावन में कोई आवाज आपको दूसरी दिखेगी ही नहीं ना सुनाई देगी।

ऐसा दुल्हन की तरह वृंदावन सजता है। एक बार कोशिश करें देखें इस चीज को। श्री हरिवंश जय जय श्री जी का जन्म सच में हुआ था। वो तो अजन्मा है। यह तो लाल जी के हृदय से प्रकट उनकी प्रेम मूर्ति है। श्री हरिवंश महाराज जी हरिवंश महाप्रभु की रचनाओं में राधा अष्टमी का क्या स्वरूप बताया गया है? चलो वृषभान गोप के द्वार। यह हरिवंश महाप्रभु ने एक पद प्रिया जी की बधाई का लिखा है और एक लाल जी की बधाई का लिखा है। इन दोनों पदों में थोड़ा ब्रज लीला का भी संपुट लिया है उन्होंने और ब्रज लीला का ही संपुट है पूरा इस पद में चलो वृषभान गोप के द्वार जन्म लियो मोहन हित श्यामा आनंद निधि सुकुमार आनंद की निधि जो सुकुमारी हैं उन्होंने जन्म लिया है मोहन के हित के कारण यह कह रहे हैं हरिवंश महाप्रभु श्री हरिवंश महाराज जी राधा जी का जन्म सच में परेशानी में हुआ था या कुछ और राधा जी का जन्म जन्म का जो वर्णन आता है जो वाणियों में और जगह से सुनते हैं पढ़ते हैं वो आ रहा है रावल का।

हमारे यहां भी चाचा वृंदावन दास जी की रचना में कह रहे हैं गोकुल बजी रावल बजी आज अब बधाई बाद में जब हरिवंश महाप्रभु का जन्म जन्म हुआ है तो उस समय का पद है हरिवंश जी की बधाई का कि गोकुल में लाल जी का रावल में प्रिया जी का और हरिवंश महाप्रभु का बाध ग्राम में इनका जन्म स्थान जो बताया गया है श्री हरिवंश महाराज जी घर पर रह कि राधाष्टमी कैसे मनाई जाए? क्या भोग पवाएं? क्या पूजा उपासना करें? देखो प्रिया जी को सबसे ज्यादा प्रिय है आपका प्रेम। आपका भाव। दूसरी चीज उन्हें प्रिय नहीं है।

लेकिन प्रकट में करने के लिए छप्पन भोग बनाओ। जितनी जैसी सामर्थ्य है वो बनाओ आप उनके लिए। लेकिन ध्वजा घर के ऊपर पीली ध्वजा वो कलश पंचपल्लभ के संग में साथ ही पीली पोशाक धारण करा के उनका स्वागत करो। उनको हृदय से अपनाओ और अपना लाड जितना हो सके उनके ऊपर न्योछावर करो। श्री हरिवंश महाराज जी राधा जी को कृष्ण जी की प्राण वल्लभा क्यों कहा गया है? राधा जी कृष्ण जी का ही प्रेम मूर्तििवंत रूप में है। इसलिए उनकी प्राणवल्लभा है। हरिवंश जी महाराज चतुराशी जी के पहले पद में प्रिया जी अपनी एक निकटतम सखी से कह रही है कि अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसो हारे।

अपने करोड़ों प्राण प्रीतम मुझसे हार रहे हैं। न्योछावर कर रहे हैं मेरे ऊपर। तो इसलिए प्राणवल्लभा हैं और वल्लभा का मतलब प्रिय कृष्ण की प्रिय है और कोई है ही नहीं उनका प्रिय केवल प्रिया जी से प्रेम है लाल जी का श्री हरिवंश महाराज जी कृष्ण जी और राधा जी एक हैं या दो अलग-अलग स्वरूप हैं? हरिवंश जी महाराज पहले पद्म ही चतुराशी जी में कह रहे हैं। कहो कौन करे जल तरंगन न्यारे। जय श्री हित हरिवंश हंस हंसनी सावल गौर कहो कौन करे जल तरंगन न्यारे जैसे मानसरोवर में हंस और हंसनी विहार कर रहे हैं तो पहचान कैसे हो कि यह हंस है और यह हंसनी है तो हरिवंश जी महाराज कह रहे हैं हंस हंसनी सांवल और गौर हंस सांवल है और हंसनी गौर है फिर कह रहे हैं कहो कौन करे जल तरंगन न्यारे जल और तरंग को अलग कौन कौन कर सकता है?

जिस समय परिभाषित करेंगे तो जल की परिभाषा अलग बनेगी और तरंग की अलग बनेगी। लेकिन दोनों को अलग नहीं किया जा सकता कि जल को अलग कर दें और तरंग अलग हो जाए। ऐसा नहीं हो सकता। इसी तरह से हमारे राधा वल्लभ लाल हैं। दो मन मिल एक भए श्री राधा वल्लभ लाल। दोनों एक हैं। लीला करने के लिए जब परिभाषित करना है, झूला की लीला करानी है, होली की लीला करानी है, रास की लीला करानी है, तब दो पार्टी बनती हैं। यह कृष्ण जी की, ये राधा जी की। नहीं तो एक हैं अलग नहीं होते। लीला करने के लिए एक से दो हैं और वैसे दो से एक हैं।

श्री हरिवंश महाराज जी आपके समय के अनुरूप यही कुछ क्वेश्चंस टीम ने सिलेलेक्ट किए थे और जज इतनी ज्यादा वर्षा हो रही है तो अब मौसम के अनुरूप भी अभी इसको यहीं एंड करते हैं। श्री हरिवाइस महाराज जी श्री हरिवाइस

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Hit Vaarta (YouTube)

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