भक्त रघुनाथ महापात्र जी का चरित्र | An AI Short Video | Pujya Premanand Govind Sharan Ji Maharaj
पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से भक्त-चरित्र — पूरी कथा ऊपर वीडियो में सुनें।
पूरा प्रवचन
बड़ा सुंदर प्रसंग है। यह श्री रघुनाथ जी नाम के एक भक्त का है। यह महापात्र रघुनाथ की चर्चा है। इनके महान भगवत भक्त पिता हुए रघुनाथ जी के। उनका नाम था कृष्ण चंद्र महापात्र। यह धनी मानी थे। खूब वैभव था। और यह सदैव संतों की सेवा करते रहते थे। भगवान की कृपा से श्री कृष्ण चंद्र महापात्रा के यहां रघुनाथ नामक एक बालक का प्रादुर्भाव हुआ। रघुनाथ का स्वभाव बच्चापन से ही बहुत गंभीर रहना सुशील नम्र और संतों के समीप बैठना। अभी छोटे बालक ही हैं रघुनाथ जी और संतों के मुख से सुनकर के भगवन नाम जपना चाहिए।
जीवन का उद्देश्य भगवत प्राप्ति आदि आदि ये जब सुनते तो उनके हृदय में निर्मल हृदय में एक संस्कार बैठ गया। मुझे नाम निरंतर जपना है और मुझे भगवान जी से मिलना है। श्री रघुनाथ जी के भी हृदय में बात उसी बच्चापन से ही बैठ गए कि भगवन नाम जपना यह जीवन का परम लाभ है। अब तो एकांत में वो प्रभु के नाम का स्मरण करना। घर में जो ठाकुर जी विराजमान थे बार-बार दंडवत करना। छोटे से बालक है जब देखा कोई नहीं तो बार-बार ठाकुर जी को दंड देखो यह कृपा संतों की छोटे बच्चा है बार-बार ठाकुर जी को देखते हैं साष्टांग दंडवत होते हैं हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं ठाकुर जी की प्रदीक्षणा करते हैं धीरे-धीरे इनकी अवस्था 17 वर्ष की हुई माता-पिता ने उनका विवाह किया कलावतीपुर के गंगाधर करण नाम के धनी मानी पुरुष की एक अन्नपूर्णा नाम की कन्या से उनका विवाह हुआ।
अन्नपूर्णा के सात भाई थे और उनमें से सबसे छोटी कन्या थी। तो यह बहुत दुलारी थी और धनी मानी थे ही तो रघुनाथ जी के साथ उनका ब्याह हुआ और खूब आदर सत्कार सम्मान प्रियता जैसे रिश्ते नातेदारों की होती है रघुनाथ दास जी को बहुत चुभा हृदय में कि मेरे हृदय की तो विकलता थी कि प्रभु मिले और यह क्या हो रहा है प्रभु मुझे क्यों बांध दिए हृदय में बड़ी विकलता जब पहले समय की जबकि यह चर्चा है बहुत कम अवस्था में ब्याह हो जाता। अगर 17 वर्ष की अवस्था थी तो 13 14 वर्ष की अन्नपूर्णा जी की अवस्था होगी।
बहुत छोटी अवस्था में ब्याह हो जाते थे। सुलक्षणा सुंदर सुशील और बहुत ही सुंदर ऐसा उसका सरल स्वभाव अन्नपूर्णा का। लेकिन इनके हृदय में चुभन नहीं प्रभु मुझे नहीं चाहिए। यह सांसारिक प्रियता नहीं चाहिए। मुझे आपके सिवा किसी से अपनापन नहीं करना। 17 वर्ष की अवस्था है। देखो संत कृपा का प्रभाव ऐसी भक्ति दृढ़ है कि इनको खुशी नहीं हुई। माता-पिता ने अपनी प्रसन्नता के लिए इनका ब्याह किया। अब तो उदासीन रहते हैं। लेकिन वो अन्नपूर्णा ऐसे मंगल स्वभाव की कभी इनसे कोई प्रश्न नहीं किया।
हृदय से निश्चय किया मेरे जीवन धन मेरे प्राणनाथ चाहे जिस स्थिति में रहे कभी इनको प्रतिकूलता नहीं दूंगी और सदैव इनके अधीन रहूंगी उसका निश्चय इनके पिता जब देखें हमारे बेटे का ब्याह हो गया तो एक प्रसन्नता आई और इन्होंने विचार किया जिसजिस को हमने ब्याज में पैसा दिया था अब किसी का ब्याज नहीं लेंगे एक उत्साह वृत्ति सबका ब्याज माफ कर दिया धीरे-धीरे उनका शरीर बीमार हुआ और ऐसा लगा कि हमारे हमारे प्राण निकल जाएंगे। रघुनाथ को समीप बुलाया। मरणासन सैया पे है और बुलाकर के कहा बेटा मैं चाहता हूं कि कभी मेरे नाम का कोई कर्जा ना रह जाए।
यह जो हमने बहुत धन दिया लोगों को संत सेवाित सत्कार आदि में तो कभी-क हमने किसी से धन भी लिए हैं। तो अगर कोई हमारे मरने के बाद तुमसे कहे कि यह हमसे कर्जा लिए थे तो उसको वापस दे देना। इतना तुम करना क्योंकि मैं भगवान के समीप जाकर के सदैव उनकी सेवा में रहूं और यहां कोई कोसे कह रहे हो तो हमारा कर्जा ले मर गया तो मैं ऐसा नहीं चाहता और वो मरणासन स्थिति में मूर्छा स्थिति में ऐसा रघुनाथ जी को आदेश किया। अब भगवान की लीला ही थी और वो पधार गए। उनकी जो मां थी रघुनाथ दास जी की कुछ समय में उनकी भी मृत्यु हो गई।
अब जब लोगों को यह पता चला कि वह मरते समय कह गए थे कि जिनका कर्जा हो दे देना तो जिनके कर्जे नहीं थे वह भी आ जाते बोले हमारा कर्जा था वो दे यहां तक कि छली कपटी लोगों ने उनका घर भी ले लिया तो अन्नपूर्णा जो उनकी पत्नी थी उनके तो पिता धनी मानी थे अपनी पुत्री को ले गए आज तक कभी रघुनाथ जी मिले नहीं उससे घर में ही रहते हुए कभी पति पत्नी के भाव से नहीं वो बस देख लेती थी मेरे ऊपर वो हर समय उदास भाव से प्रभु का चिंतन करते भगवान लीला बिहारी ऐसे हैं कि छली कपटी लोगों ने कि मेरा भी कर्जा था मेरा भी कर्जा घर भी छीन लिया उनका बहू तो चली गई अपने मायके वो सात भाई थे तो लिवा गए यद्यपि वो जाना नहीं चाहती थी फिर भी लिवा गए अब रघुनाथ दास जी अकेले हो गए रघुनाथ जी अब तो जहां कोई उन्हें भोजन दे देता अब उनको कोई चिंता नहीं बस बस निरंतर नाम जप करना और भगवत चिंतन में मगन रहना और ये सिद्धांत हृदय में उतर गया जा विधि राखे राम तह विधि रहिए जोई जोई प्यारो करे सोई मोह भावे जैसे प्रभु मुझे रखे कोई शिकवा शिकायत नहीं ये
देखो कृपा यह कृपा है कृपा भगवान कहते जिस पर मैं कृपा करता हूं उसके सारे राग नष्ट कर देता हूं खत्म माता-पिता अंतर्ध्य हो गए संपत्ति जो थी वो कुछ बट गई कुछ छीन गई आप पत्नी को ले गए परिवार के जन उसके मायके वाले आप अकेले अब जब कोई भोजन दे देता पा लेते नहीं तो खूब नाम जप करते भगवन नाम चिंतन में डूबे रहते अब जो भगवत मार्ग के पथिक होते हैं उनके हृदय को प्रभु कैसे आकर्षक अब इनके मन में आया कि यहां गलियों में भटकने से क्या है प्रभु के किसी धाम का हम आश्रय
ले विचार किया नजदीक कौन धाम पड़ता है तो कलावती से नजदीक पड़ते थे जगन्नाथ पुरी विचार किया मैं जगन्नाथ पुरी जाऊं वही ठाकुर जी के जूठन पाऊं और अपना जीवन व्यतीत करूं ऐसी भावना से वो भगवन नाम जप करते हुए भाव में भर के पूरी के लिए चले नीलाचल पुरी श्री जगन्नाथ धाम और वहां जाकर के मंदिर में साष्टांग दंडवत किया और बस दरवाजे के में जो भिक्षुक जन खड़े रहते थे वहां जो उनको मिल जाता उसी से उदर पोषण करते हैं। अब प्रभु से खड़ेखड़े दरवाजे पर प्रार्थना करते प्रभु मैं अनाथ हूं ना मेरे माता है ना पिता है और ना मेरे कोई भाई है ना कोई मेरा मित्र है जीवन में और ना मैंने आज तक किसी को अपना माना है प्रभु आप मेरे हो स्वीकार कर लो हे प्रभु आप मेरे हो मैं आपका हूं यह स्वीकार कर लो बहुत अंदर से विकल हुए सिंह पौर में वही जब मंदिर बंद हुआ तो सो गए तो ठाकुर जी ने स्वप्न में उनसे आकर के कहा कि मैंने स्वीकार किया तू मेरा है।
अब तो बहुत आनंद जब जागे तो बहुत क्योंकि हमारी प्रार्थना स्वीकृत हो गई। ठाकुर जी ने स्वप्न में कहा कि तुम जिस भाव से मुझे स्वीकार करो। मैंने तुम्हें स्वीकार कर लिया। अब तुम आज से अपने को अनाथ मत मानना। मैं तुम्हारा हूं और तुम हमारे हो। अब तो उनको बड़ा आनंद आने लगा। बड़े भाव से जगन्नाथ जी के दर्शन करते रहते और वही सिंह पौ में जो कुछ भिक्षुकों के साथ उनको मिल जाता उसी से उदर पोषण करते फटा पुराना वस्त्र अपने शरीर में डाले। अब तो किसी की कोई चिंता नहीं कोई अब अंदर से कोई आकांक्षा नहीं।
कोई संबंध ही नहीं। दृढ़ भावना से भाव में भर के विश्वास पूर्वक कातर भाव से प्रभु को पुकारते रहते। प्रभु का नाम कीर्तन करते रहते। प्रभु के कृपा प्रसाद से उनके हृदय में एकमात्र भगवत भक्ति रह गई। केवल भक्ति का ही पूर्ण राज्य हृदय में। अब जब ये कुछ जगन्नाथ पुरी से यात्री जन गए तो जो अन्नपूर्णा के पिता थे, माता थे और सात भाई थे, वह धनी मानी थे और बहुत ही कठोर बुद्धि के थे। उन लोगों को जब यह कुछ लोगों ने बताया कि जगन्नाथ पुरी में हमने देखा कि तुम्हारे जो जामाता है ना दामाद फटे पुराने कपड़े पहने वहां भीख मांगते हैं वही दरवाजे में देखा जगन्नाथ जी के तो आपस में अन्नपूर्णा के माता पिता ने विचार किया कि हम अपनी पुत्री को क्यों जीवन भर ऐसे बैठा ले रहे हैं वो तो भिखारी है उसका सब कुछ नष्ट भी हो गया है और हम तो धनी मानी है हम दूसरा विवाह अपनी पुत्री का करते हैं।
बिना उस अन्नपूर्णा से सलाह लिए उन्होंने उनका ब्याह तय किया। वहां के राजमंत्री के पुत्र से और वह जानता था कि इसका ब्याह हो गया। पर बहुत सुंदर सुशील स्वभाव की थी और वह बहुत ही गंदे स्वभाव का था जो राजमंत्री का बेटा था। वो राजी हो गया ब्याह करने के लिए। अब पिता की यह बात जब अन्नपूर्णा के कान में पहुंची धीरे-धीरे कि हमारा दूसरा विवाह हो रहा है राजमंत्री के लड़के से। अब तो वो बहुत कांप गई। उसने कहा ऐसे कैसे हो सकता है? ठीक है हमारे पति हमसे कभी बोले नहीं।
ठीक है हमारे पति के पास धन नहीं रह गया। ठीक है। हमारे पति भिक्षावृत्ति से जगन्नाथ जी के दरवाजे पर बैठे रहते हैं। लेकिन है ना मेरे प्रीतम है ना जब है तो मैं दूसरे को कैसे स्वप्न में भी स्वीकार कर सकती हूं। गंगाधर और मंत्री पुत्र दोनों ने यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब विवाह पक्का फाल्गुन शुक्ला पंचमी तिथि तय हो गई। अन्नपूर्णा ने जब यह सब बातें सुनी तो विचार किया और जगन्नाथ जी का स्मरण किया। प्रभु ऐसा कैसे हो सकता है? मेरे पति आपकी शरण में और मुझे दूसरे के साथ जाना पड़े।
मैंने निश्चय किया है कि जिनसे मेरा ब्याह हुआ वही मेरे प्रीतम है। प्रभु आप ही मेरी रक्षा कर सकते हो। अंदर ही अंदर वो प्रभु से प्रार्थना करने लगी। रात दिन बैठे-बैठे घुटती। अब उसे खाना पीना अच्छा नहीं लगता। बोलना चलना अच्छा नहीं लगता। रातों जग के जगन्नाथ जी को पुकारती रहती। कोई ऐसा उपाय कर दो जिससे मेरा ब्याह रुक जाए। एक दासी थी जो अन्नपूर्णा को मां की तरह दुलार किया था। धाई मां उसे कहते हैं। प्रकट करने वाली मां और उसकी सेवा करने वाली धाई मां। बड़े घरों में सेविका रूप से आजीवन दासी भाव से जो रहती थी वो वो धाई मां के समीप गई और उसकी गोद में बैठकर कहा कि मां मुझे बचा लो।
मैं अपने धर्म से भ्रष्ट नहीं होना चाहती। और यह दुष्टता का रूप लिए हुए मेरे माता-पिता मंत्री के पुत्र के साथ ब्याह निश्चय कर चुके हैं। फाल्गुन शुक्ला पंचमी को कोई उपाय बताओ। किसी दूसरे को छूने भी नहीं दूंगी। धाई मां ने कहा बेटी तू चिंता मत कर। मैंने तुझे पाला पोसा है। कोई ना कोई नीलाचल नाथ जगन्नाथ जी महाराज कोई ना कोई उपाय जरूर करेंगे। आप तो निश्चिंत रहे। दासी एक दिन विचार करते हुए निकली और मोहल्ले में पता लगाया। बहुत बड़ा नगर था कलावती। मोहल्ले में पता लगा कोई जगन्नाथ पुरी जा रहा है क्या?
तो उसको पता लगा कि कुछ लोग जगन्नाथ जी के दर्शन करने जा रहे हैं। वो आई अन्नपूर्णा से कहा कि बात बन गई जगन्नाथ जी के दर्शन करने अपने ही मोहल्ले के कुछ भगत लोग जा रहे हैं। आप एक पत्र लिखो और वह पत्र रघुनाथ जी को ढूंढ कर दे देंगे और वो आ जाएंगे तो ब्याह रुक जाएगा। वह रोक सकते हैं। वह तुम्हारे पति हैं। वह आ जाएंगे तो अपने आप समाज है। समाज सब साथ हो जाएगी और तुम्हारा ब्याह रुक जाएगा। उसने एक पत्र लिखा हे प्राणनाथ हे जगन्नाथ मैं आपको प्रणाम करती हूं। मेरे प्रीतम आपकी ही शरण में है।
मैं उनकी दासी हूं। आगामी फाल्गुन शुक्ला पंचमी के दिन राज्य मंत्री के पुत्र के साथ मेरा विवाह होना निश्चित किया गया है। यदि आपने कृपा ना की और आकर के विवाह ना रोका अपने पातव धर्म से मैं विचलित नहीं होने वाली। समय तक आपकी बाट देखूंगी। यदि आप आए नहीं प्राण त्याग दूंगी। अन्नपूर्णा ने दासी के हाथ में धाए मां के हाथ में पत्र दिया। धाय मां पत्र लेकर के उनके पास गई जो पूरी दर्शन करने जा रहे थे। हाथ जोड़कर के कहा कि यह पत्र उनको देना है। सुना है कि वह सिंह पौर में दरवाजे पर रहते हैं।
भिक्षुक वेश में उनका रघुनाथ नाम है। यह पत्र उनको आप दे देना। बहुत कृपा होगी। किसी का जीवन बच जाएगा। यदि आप पत्री वहां तक पहुंचा देंगे। भक्त हृदय उन लोगों ने कहा आप चिंता मत करो। जगन्नाथ जी के दर्शन करके अब हमारा दूसरा कार्य यही रहेगा। रघुनाथ जी को खोजना कहीं भी जगन्नाथ पुरी में है तो जब तक वो मिलेंगे नहीं उनको पत्र नहीं दूंगा तब तक वापस नहीं आऊंगा आप चिंता मत करो बड़ी सहानुभूति प्रकट की उन लोगों ने भरोसा दिया और वह पूरी के लिए रवाना हुए माघ महीना के शेष होते होते वो पूरी पहुंच गए कई दिनों तक दर्शन करके वो खोज करते रहे क्योंकि कुछ समय के लिए रघुनाथ दास जी वहां आते और जो कुछ मिलता लेते और एकांत में समुद्र किनारे बैठकर के भगवान नाम जप करते तो एक दिन अकस्मात मंदिर के सिंह पर्व पर उन्होंने देखा फटे पुराने वस्त्र मलिन भष और ओठ हिल रहे हैं।
भगवन नाम चल रहा है। पूछा तुम्हारा रघुनाथ नाम है। उन्होंने कहा जी तो उन्होंने कहा ये तुम्हारी पत्नी ने पत्र दिया है। विचार किए कि जगन्नाथ जी के सिवा मेरा तो कोई है नहीं। पर अगर वह जगन्नाथ धाम में पत्र भेजा है तो जगन्नाथ जी के लिए ही है। इस भावना से ले लिया और पहले प्रभु को अर्पित किया ऐसे देखो प्रभु ये पत्र आया है। फिर उन्होंने पढ़ा पढ़ते ही चित्त व्याकुल हो गया। क्योंकि मेरी पत्नी इसलिए व्याकुल नहीं हुआ। एक जीव जो इस शरीर से संबंध मानता है और यह शरीर प्रभु का शरणागत है और वह आत्महत्या कर लेगा।
इस बात से वह व्याकुल हो गए। और अब फाल्गुन शुक्ला पंचमी के केवल 10 दिन शेष रह गए हैं। और पूरी से अगर पैदल चला जाए तो एक महीना का रास्ता है। पहुंच नहीं सकता। अगर हम भागे भी तो नहीं पहुंच सकते और वो शाम तक आत्महत्या कर लेगी। अगर उस तिथि को ना पहुंचे क्या करूं? थोड़ी देर विचार करने लगे। फिर एकदम प्रसन्न हुए। जो जगन्नाथ जी चाहेंगे वही होगा। पत्र हमने उनको दिखा दिया। मनोरथ कल्पद्रुम तो जगन्नाथ जी हैं। कृपा सागर हैं। विपत्ति नाशक हैं। उनको जैसा उचित होगा वो करेंगे।
एकदम निश्चिंत हो गए। थोड़ी देर के लिए चिंता बड़े बड़ों के हृदय में आ जाती है। निश्चिंत हो गए रघुनाथ जी जगन्नाथ जी जाने और भगवत स्मरण करने लगे। सर्वांतर्यामी सर्व समर्थ करत अकर अन्यथा करतुम प्रभु से कोई बात छिपी नहीं और कोई बात ऐसी नहीं जो पूर्ण ना कर सके। सिंह द्वार पर चितड़े में लिपटे हुए भगवन नाम स्मरण करते हुए वह सो गए। रात्रि में शरणागत व्सल भगवान जगन्नाथ जी ने लीला रची। कलावती पूरी जो गंगाधर करण जी जहां रहते थे उसी दरवाजे पर आंख खुली। श्री रघुनाथ जी की जब जगे सुबह तो अब सिंह पौर में सोए थे और सीधे वही उनके लिए कुछ दुर्लभ है।
रघुनाथ जी की आंख खुली तो देखा कि यहां तो सिंह पौर नहीं ये तो जगन्नाथ जी का मंदिर नहीं प्रभु सर्व्चर्यमय है। आंख खुलते ही देखा कि ये किस ग्राम में आ गए। कौन से अब ब्याह जब हुआ था तब गए थे। कभी दोबारा ससुराल गए नहीं। दूल्हा बन के गए थे तो ऐसा कुछ खास याद नहीं था तो लोगों से पूछा कि यह जगन्नाथ पुरी तो है नहीं और स्वप्न में हूं नहीं जागृत हूं ऐसे छू के देखा कि जाग रहा हूं ये है कौन सा नगर और ये किसका महल है आप बताने की चेष्टा करें तो लोग कहते तुम पागल पहले लोगों से पूछते मैं जाग रहा हूं ना तो लोग समझते कहते भाई तुम जाग रहे हो आप बोले जग जगन्नाथ पुरी है कि नहीं?
बोले यह जगन्नाथ पुरी ये कौन सा शहर है? क्योंकि एकदम रातों रात सब हुआ। बोले कलावती नगर है और जहां तुम बैठे हो सामने महल महान धन संपन्न जो गंगाधर है उनका है। गंगाधर तो मेरे ससुर का नाम था। अच्छा तो ये जगन्नाथ जी की लीला हुई। पत्र का उत्तर सीधे हमें ऐसा देखो कैसी लीला रची। सीधे रात्रि में ही जगन्नाथ जी ससुराल पहुंचा दिए उनको। अब जब घर वाले निकले तो देखा फटे पुराने कपड़े में रघुनाथ भाग के गया। लड़का जो सात भाई थे बोले सब गड़बड़ हो गया। क्या बोले वो आ गया।
अन्नपूर्णा का जो पति था वो तो सामने दरवाजे में बैठा हुआ है। भागे माता-पिता और बाहर जाकर बोले अरे बेटा बाहर क्यों बैठे हो? यह लोग सब बड़े कपटी स्वभाव के थे और तत्काल हाथ पकड़ कर घर के अंदर आए कि कोई जान ना पावे कि इनका दामाद है क्योंकि ब्याह तय हो गया है फिर लोग हंसी उड़ाएंगे अंदर ले गए अन्नपूर्णा ने भी देखा पति आए तो मानसिक प्रणाम किया एकांत में बैठी हुई थी बहुत जगन्नाथ जी के प्रति बार-बार अहो प्रभु बड़े कृपालु बड़े कृपालु नेत्रों से प्रेमाश्रु धारा बहने लगी ध्यान में मगन हो गई प्रभु की प्रभु आज मैंने देख लिया आप हमारी आर पुकार सुन लिए प्रभु तुम्हारे बिना ऐसा कौन खेल कर सकता है अभी 10 दिन बकाया है और पहले ही हमारे पति को भेज दिया वो बहुत आनंद में मगन है रघुनाथ तन मन की सुधि भूले हुए जगन्नाथ जी से बात कर रहे अंदर ही अंदर प्रभु कैसे कृपाल हो कैसे लीलाधारी हो और पत्नी भी उनकी भाव में डूब रही है और यह सब पूरा परिवार जल रहा है अब क्या किया जाए यह तो आ गया।
अब क्या किया जाए? क्योंकि अगर यह यहां जीवित है तो ब्याह कैसे हो सकता है? समाज भी तो है और आपस में बैठकर के सलाह करने लगे। तो सास ने कहा तुम चिंता मत करो। विधान सब बनाएंगे। पहले कुछ खवा पिया के इसे राजी करें। भोजन पवाया कपड़े अच्छे दिए और कहा कि आप बहुत दिनों बाद पधारे हैं। बड़ी कृपा है। आप कमरे में विश्राम करें। अन्नपूर्णा मन में डर गई कि यह कपटी लोग जो हमारे ना चाहने पर भी ब्याह तय कर रहे थे। हमारे पति से इतना प्रेम दिखा रहे हैं। इसमें कोई कपट है।
अंदर ही अंदर वो समझ गई कि यह जैसे कटोरा तो सोने का है लेकिन भरा उसमें विष है। प्रियता तो दिखा रही है जा माता जैसी ही कि भाई हमारा दामाद आया है लेकिन अंदर इनकी जरूर छल कपट है। हृदय में वो विचार करें कि प्रभु हमें डर लग रहा है कि कोई ना कोई विषम लीला ना कर दे। अब जब वह सैया पर लेटे हुए हैं कमरे में रघुनाथ जी धीरे-धीरे पतिव्रता अन्नपूर्णा जी गई और उनके चरणों को स्पर्श किया धीरे-धीरे चरण दबाने लगी और उनके मन में बहुत बातें आ रही कि मैं अपने पति से बोलूं लेकिन एक भी शब्द ना बोल पाए।
रघुनाथ जी देखा कि पत्नी चरण दबा रही शांत गंभीर। उनके भी मन में आया कि मैं इसको ढांडस बनाऊं लेकिन ना वह कुछ बोल पाए ना वह कुछ बोल पाए। अन्नपूर्णा के माता आई और बोली चलो चलो देखो थके हुए आए उनको सोने दो तुम हटो और बेचारी बहुत लज्जा संकोच से उसको हाथ पकड़ के अन्नपूर्णा का ले गई एकांत कमरे में तू यहां बैठ दामाद को सोने दे और वो समझ गई कोई ना कोई इनकी ऐसी मंत्रणा होगी जिससे हमारे पति की हानि हो एक कोठरी के कोने में गंगाधर उसकी पत्नी और सातों पुत्र पुत्र मिलकर विचार किया क्या किया जाए इसको रात में मार दिया जाए तो उन्होंने कहा अगर ऐसे मारोगे तो अन्नपूर्णा हल्ला मचा देगी कोई ऐसा उपाय
करो जिससे अन्नपूर्णा भी ना जान पाए ये मर जाए और सुबह हम लोग यह कह देंगे कि काले सर्प ने काट खाया ये मर गए फिर कोई बात नहीं होगी फिर तो ब्याह हो ही जाएगा वो तो तय ही है फाल्गुन शुक्ला पंचमी को अब वो सला सलाह षड्यंत्रकारी ये माता-पिता और भाइयों ने किया और बहुत ही तीक्षण विष मंगाया गया और संध्या काल के जो भोजन की तैयारी थी सुंदर सुंदर पुआ खीर पूरी और मिठाई सब में विष मिला दिया देखो कैसी पाप मूर्ति परिवार के जन है सब में विष मिला दिया कि इस भिखारी को
मार दो और उस राज मंत्री के पुत्र के साथ जो ब्याह तय है हमारी पुत्री का ब्याह हो जाएगा। वो समझ गई कि कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है। वो रसोई में गई। बोली मां मुझे भी सेवा का अवसर दीजिए। मेरे पतिदेव आए। अरे नहीं तू तो नहीं मेरे दामाद हैं। आज तो मुझे कल भले तू पवा देना। आज शाम की रसोई में तेरा प्रवेश नहीं। तू तो बैठ जाके दूर। ना तो पति से मिलने दे रहे हैं ना रसोई में आने दिया। उसको पक्का विश्वास हो गया। तो उसने धाय मां से कहा कि तुम कृपा करो हमें किसी तरह संकेत मिलना चाहिए कि इन लोगों का क्या षड्यंत्र हो रहा है।
कोई ना कोई तो है मेरा हृदय कह रहा है कुछ ना कुछ तो गड़बड़ कर रहे हैं। कुछ ना कुछ मेरे पति का अहित करना चाहते हैं। अब धाय मां तो दासी थी। उसके लिए तो कोई रोग था नहीं। वह धीरे से वहां के सब रसोई के रहस्य को जान के आई और कहा बेटी यह तो बहुत बड़ी निंदनीय बात है कि तुम्हारे माता-पिता और भाई मिलकर बहुत तीक्षण जहर इस स्वादिष्ट भोजन में मिलाया गया है और यह सब तुम्हारे पति को मारना चाहते हैं। अब तो वो घबरा गई। हिम्मत की कि जो कुछ भी हो पति के प्राणों की रक्षा करनी चाहिए।
गई दौड़ पड़ी उसकी मां रसोई में प्रवेश होते ही रोक दिया। अरे तुम क्यों आ रही हो? तो उनका मां मेरी भी इच्छा है। कुछ ना कुछ तो मेरी भी सेवा लगे ना। मेरे पति आए हैं। मेरी इच्छा है। ना अब उसने भगवान की ऐसी लीला थी कि जो अपने लिए भोजन तैयार किया था सास ने वो भोजन उठाई और दूसरे कमरे में रखने के लिए गई। इतने में अवसर मिला जो थाल सजाई गई थी जहर से भरे हुए पदार्थों से रघुनाथ जी की उसमें पिष्टी मिठाई थी जो दो पीस में चिपकी हुई थी तुरंत देखा उसने और जैसे छौक लगाने में एक पत्र होता है तेज पत्र वो जो छौक लगाने में होता है ना उसको तत्काल उसने लिया और अपने काजल से लिखा विष है विष है लिख के उस पिष्टी में दबा के सबसे ऊपर रख दिया और भगवान से प्रार्थना की और जानती थी कि प्रसाद पवाने में पहले पवाया था कि मीठा इनको बहुत पसंद है।
अगर थाल में मीठा होता तो सबसे पहले मीठा पाते। उसको पता था और उसने जगन्नाथ जी से प्रार्थना किया हे भगवान मेरी प्रार्थना सुन लो। मेरे पति सबसे पहले इसी पिष्टी मिठाई को ले और वो उसे खोल कर देख ले। इतनी आप कृपा करना। सोने की थाल में सुंदर सुंदर कटोरियों में खीर सब्जी पूरी यह सब और सबके ऊपर फिर मिठाई अब वो यह रहस्य मां नहीं जान पाई कि उस मिठाई के बीच में उस तेज पत्र में लिखा है कि विष है ऐसा लिखकर के उसने रघुनाथ जी के सामने थाल पहुंची रघुनाथ जी तो जय जगन्नाथ आंख मूंदा और कीर्तन करने लगे और भावना में एक एक कवल जगन्नाथ जी को पवाने लगे थोड़ी देर के बाद फिर आंख खोली और जय जगन्नाथ और जे वो पिष्टी उठाई सब पूरे परिवार के जन ताक रहे हैं कि अब तो बस पाएगा थोड़ी देर में मर जाएगा ऐसे पिष्टी खोली तो नजर बचा के ऐसे देखा कि विष है खिड़की से पत्नी भी देख रही थी तो उन्होंने ऐसे देखा पत्नी समझ गई कि देख लिया बहुत प्रसन्न हुई हट गई वहां से अब वो विचार करने लगे कि यह तो हमने जगन्नाथ जी को अर्पित कर दिया जो वस्तु जगन्नाथ जी को अर्पित कर दिया।
जब प्रभु को भोग लगा दिया। अपने लोग हो तो कह दे कोई साक्षात थोड़ी लगाया तो भावना में लगा है। हम नहीं पाएंगे जहर है इसमें लेकिन निष्ठा। उन्होंने कहा जब हमने जगन्नाथ जी को पवा दिया। मेरे प्रभु ने पा लिया तो फिर क्या मरना तो एक बार है ही ना। हम प्रभु को अर्पित किए हुए प्रसाद को नहीं छोड़ सकते। प्रभु को तो लगा दिया भोग। अब कहे कि इसमें जहर है फिर ऐसा नहीं। जय जगन्नाथ। पाना प्रारंभ किया। जैसा पूर्ण पाया जाता है वैसे ही पाते पाते शरीर नीला होने लगा। क्योंकि जहर थाई आंखों के सामने अंधकार छाया मूर्छाई गिर।
अच्छा वो अन्नपूर्णा जी इसलिए प्रसन्न है कि पति ने पढ़ लिया। आप काहे को खाएंगे? वो तो चली गई प्रसन्न होकर। भगवान ने मेरी बात सुन ली और वो मातापिता भाई सब बिल्कुल खड़े हैं। पूरा प्रसाद जिसे पाया जाता है पाते ही आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। शरीर नीला पड़ने लगा गिरे और प्राण निकल गए। जब उनको दुष्टों ने देखा कि मर गए। तो धीरे से दरवाजा लगा दिया और कि थोड़ा और रात्रि हो जाए। फिर हम हल्ला मचा देंगे कि देखो दामाद को सांप ने काट खाया और यह मर गए तो अन्नपूर्णा भी कोई शंका नहीं कर पाएगी।
फिर हम इनको दफना देंगे। ऐसी भाव बड़े प्रसन्न हुए वो सास ससुर और वो भाईजन की बढ़िया हमारी जो षड्यंत्र था वो पूरा हुआ। हमारी बात पूरी हो गई। अब ये मर जाएगा। अब राजमंत्री के साथ ब्याह होगा। अब वो विशिष्ट का प्रभाव पड़ा। पूरा शरीर नीला हो गया। जब सबको प्रसन्न देखा तब उसके मन में आई अन्नपूर्णा के मन में उसने धाए से कहा कि तुम दौड़ के देखो क्या बात है ये प्रसन्न क्यों है धाए ने कहा ये खुसूर खुसूर आपस में बात कर रहे हैं हमें लगता है कोई खड इनका काम कर गया उसने विचार किया कि जब मेरे पति मेरे सामने पढ़ के देख लिए थे विष है फिर वो खाएंगे क्यों जब खाएंगे नहीं तो कोई ऐसा षड्यंत्र इनका चलेगा नहीं ध से कहा तुम दौड़ के कमरे में झांक के देख के आओ तो एक दीपक जल रहा था।
उसमें देखा पूरा शरीर नीला फेन निकला हुआ। आंखें खुली भाग के आई और कहा गजब हो गया। उनका शरीर नीला है और हमें लगता है उनके प्राण निकल गए हैं। अब तो विकल हो गई। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि हमने तो लिख दिया था इसमें विष है और पति ने पढ़ भी लिया था। ऐसा क्यों? वो भाग के गई और खिड़की से झांक कर के देखा तो पति को निष्प्राण देखा। अब तो कांप गई और जगन्नाथ जी से कहा कि आपके होते हुए प्रभु ऐसा कैसे हो गया? हे दीन बंधु हे पतित पावन ऐसा कैसे हो गया? प्रभु आप तो सर्व समर्थ है और हमने लिख के भी आपकी प्रेरणा से दिया और उन्होंने आपकी प्रेरणा से पढ़ा भी फिर ऐसा कैसे हो गया?
बहुत अंदर से बहुत वो दुखी है। विकल हो रही है। फिर अन्नपूर्णा एकांत में बैठकर के आर भाव से प्रभु से प्रार्थना करें हे करतुम अनथा करतुम सर्व समर्थ स्वामी आपके लिए विष को अमृत कर देना। क्या कोई आश्चर्य की बात हो सकती है? मेरे प्रीतम को बचा लो। हे प्राण प्यारे मेरे प्रीतम को अब वो बार-बार एकांत कमरे में बैठी बार-बार आती हिम्मत नहीं पड़ रही कि अब करें तो क्या करें क्योंकि देखती है कि पति पधार गए और यह दुष्ट जन आनंदित हो रहे हैं उसके हृदय में अंधकार छा रहा क्या करूं चारों ओर अपने आप को निर्बल देखकर के वो आर भाव से प्रभु को पुकारा हे जगन्नाथ कृपा करो हे करुणामय कृपा करो आर भाव से जब इस देवी ने पुकार की तो अखिल विश्व के स्वामी श्री ठाकुर जी महाराज रुक नहीं सके।
तत्काल देखा कि कमरा प्रकाशित हो गया। उसने खिड़की से झांक के देखा कमरा प्रकाशित हो गया और नील श्याम मेघ जैसी अंग का है। नौ किशोर अवस्था है और रघुनाथ दास जी के सर को अपनी गोद में रख के जैसे मां दुलार करती है। ऐसे प्रभु हाथ फेरे। प्रभु का स्पर्श होते ही रघुनाथ जीस जी के शरीर में जैसे बिजली दौड़ पड़ी हो करत है वह बहुत आनंदित हुई घनश्याम के श्याम अंग की कांत से संपूर्ण वो कमरा प्रकाशित हो रहा है अब वो लोग तो प्रसन्न है अलग कमरे में सब बैठे हुए है कि बहुत बढ़िया बात बन गई वो तो मर ही गया है अब उसको दफना देंगे और ब्याह हो जाएगा लेकिन श्री ठाकुर जी की लीला प्राण पति के मस्तक पर जगत पति का हाथ देखकर के बहुत आनंदित हुई।
ठाकुर जी ऐसेसे हाथ फरा रहे हैं। फिर मधुर स्वर में ठाकुर जी बोले कि मेरे लाल रघुनाथ उठ कोई सृष्टि में ऐसा विष ही नहीं बना जो तुझे अचेत कर सके। उठ जा। ऐसा प्रभु बोल रहे हैं। देख मैं आ गया हूं। उठ जा। ऐसा ठाकुर जी ये भी बोले तो वो जैसे कोई बहुत गहरी नींद से सो के उठा हो उठे। अब जो ही उठे ठाकुर जी अंतर् ध्यान रघुनाथ जी को लगा कि बहुत थके हुए थे आज बहुत गहरी नींद आ गई अब वो पतिव्रता बहुत प्रसन्न हुई बस हट गई वहां से कि कोई जान ना पावे एकांत में गई अब वो बहुत आनंदित है कि मेरी बात श्री ठाकुर जगन्नाथ जी ने सुन ली और उसको ठाकुर जी का दर्शन हुआ देखा ठाकुर जी आए अब आप देखो उसका क्या भजन है एक भगवत भक्त पति के प्रति पूर्ण आसक्त है तो देखो अभी अभी साक्षात जगन्नाथ जी का दर्शन रघुनाथ जी को नहीं हुआ।
उनकी पत्नी को हो गया। देखा कि ठाकुर जी आए हैं। गोद में सर रखा। रघुनाथ जी का दुलार और रघुनाथ जी भी जगह ठाकुर जी अंतर्धान हो गए। रघुनाथ जी उठकर के बैठे और जैसे आंख मलते हुए कोई नींद से जगा हुआ और बोले आज तो बहुत सुख मिला नींद में। फिर विचार किया कि नहीं नहीं मैंने तो जहर भरा भोजन पाया था और मुझे व्यथा भी हुई थी। मैं मूर्छा को भी प्राप्त हो गया था। बड़ी वेदना बड़ी जलन अंगों में हुई थी। तो यह मेरा मतलब कि मेरे प्राण निकल गए थे। मुझे शायद प्रभु ने जीवित किया है।
मैं सो नहीं रहा था। मैं तो मर चुका था। बस समझ गया। जगन्नाथ जी समझ गया तुम्हारी करुणा। आपने ही मुझे बचाया है। बहुत आनंदित हुए और बड़े प्यार से बार-बार प्रभु का ध्यान कर रहे। अब तो और आनंद क्योंकि प्रभु ने स्पर्श किया है ना भक्त रघुनाथ जी व्यथा हारी हरि के प्रति पूर्ण आसक्त होकर के कभी जोरजोर से हंस देते हैं कमरे में। कभी चीख कर रो देते हैं और कभी प्रेम प्रलाप बातें कर रहे हैं। अब तो उधर आवाज पहुंची। अब वह षड्यंत्रकारी सात भाई और उसकी मां और उसके पिता ने सोचा कि कमरे से हंसी की आवाज कैसी आ रही वो तो मर गया था भागे जब भाग के आकर देखा तो बावरे से कभी जगन्नाथ जी के ध्यान में हंस रहे कभी रो रहे हैं कभी प्रेम उनको लगा अरे बोले नकली जहर था क्या बोले नहीं जहर तो असली था ये बच कैसे गया अब तो हृदय में उनके भय समा गया अब गंगाधर उसकी स्त्री सातों लड़के भयानक चिंता में जलने लगे कि अरे यह तो मरा ही नहीं।
इन दुष्टों ने देखो विचार करके जहर दे दिया। जब देखा कि जहर का तो कोई प्रभाव नहीं। अब वो तो कांप गए। बाहर से झांके अब तो उनका हृदय जलने लगा। अब क्या करें? अब वो पापियों के लिए एक एक क्षण महान कष्टदायक हृदय जल रहा है। क्या करें? अब वह विचार करने लगे कि क्या करें? कैसे क्योंकि मैंने तो जहर भी दिया और यह मरा नहीं बच गया और ब्याह की तारीख पक्की है। मंत्री के पुत्र के साथ ब्याह होना है। सब कांप रहे हैं। विचार कर रहे क्या करना चाहिए? और इधर जय जगन्नाथ जय हरि जय जगन्नाथ जय हरि।
ये तो नाम कीर्तन करते हैं। कभी नाचते हैं, कभी हंसते हैं, कभी गाते हैं। रघुनाथ जी तो आनंद में मगन है और यह सब जल रहे। इनका हृदय एक तो अपराध बन गया। दूसरी बात ऐसी कलशता की भावना करने वाले को कहीं शांति मिल सकती है क्या? भक्त तो झूम रहा है और यह सब जल रहे। अब उनके हृदय में आया कि यह कोई मामूली आदमी नहीं है। जो जहर खाकर के भी जिंदा है। तो सब ने इशारे से विचार किया इसी के पैर पकड़ो। फिर कोई बाद में चाल चली जाएगी। पहले तो पैर पकड़ो। तब गए चरणों में सब प्रणाम किया और कहा कि मेरे से गलती हो गई।
मुझे क्षमा करो। श्री रघुनाथ जी ने प्रसन्न मुद्रा में कहा कि इसमें आपका कोई दोष नहीं। जगन्नाथ जी कृपालु है। मेरा कोई कर्म भोग था जिसको पवित्र करने के लिए आप लोगों के द्वारा भगवान ने ऐसी चेष्टा कराई। यह देखो हो सकता है मैंने पूर्व जन्म में किसी को जहर दिया हो तो आपके द्वारा प्रेरित होकर जगन्नाथ जी मेरे पाप कर्म को निवृत्त कराना चाहते इसलिए मुझे आप लोगों से जहर दिलाया इसमें आपका कोई दोष नहीं ये भक्त का हृदय वो मेरा कर्म भोग था आप निश्चिंत रहिए मेरे हृदय में आपके प्रति कोई भी दोष बुद्धि नहीं है यह सब जगन्नाथ जी की लीला है अब आप आनंदित रहिए मैं मैं आपके प्रति तनिक भी द्रोह भाव नहीं कर रहा हूं ऐसा और आप लोग मुझे दरिद्र नीच के प्रति अगर ऐसा भाव रखते हो कि इसके पास तो कुछ है नहीं।
लड़की दुख पाएगी दूसरे के साथ ब्याह कर दे तो यदि अन्नपूर्णा राजी हो तो आप ब्याह कर दो। अगर ना राजी हो तो फिर ऐसा अपराध मत करो। मैं तुमसे प्रार्थना करता हूं। मैं जबरदस्ती नहीं कह रहा। यदि वह राजी है तो आप कर दो। अगर नहीं राजी है तो आप ही छोड़ दो। मैं जगन्नाथ जी ले जाऊंगा उनको। जगन्नाथ जी के पास ही रहेंगे। वही भिक्षा मांग करके पाएंगे। आप ऐसा ना करो। इसके बाद रघुनाथ दास जी जपने लगे। भगवन नाम उन लोगों से बोलना बंद कर दिया। वो सातों पुत्र सहित गंगाधर पीछे लौटे और विचार करने लगे कि क्या करें?
अब क्या करें? रघुनाथ दास जी ने जो हमसे कहा तो क्या करें? अब अन्नपूर्णा तो राजी है नहीं कि दूसरे के साथ ब्याह करें। रघुनाथ दास जी ने उनके जो दिए हुए कपड़े थे उतारा अपना फटा चद्दर ले आओ। से ओढ़ा और जाकर के दरवाजे के बाहर बैठ गए और कहा यदि अन्नपूर्णा राजी ना हो तो आप तुरंत उसे बाहर निकालो और हम उसको लेकर जगन्नाथ पुरी जाएंगे। अगर वह राजी हो तो तुम ब्याह कर दो। मैं जगन्नाथ पुरी चला जाऊं। वो बाहर जाकर के विराजमान हुए। गंगाधर बहुत कुछ विचार करने लगे। पुत्रों सहित अंदर गए।
अब क्या किया जाए? अन्नपूर्णा अब तक तो शांत बैठी थी। क्योंकि प्रभु उसके पति जीवित हो गए थे। अब उसने विचार किया कि मैं बाहर निकलकर अपने दुष्ट माता-पिता से कह दूं कि अब तुम्हारे रोके नहीं रुकूंगी। लेकिन वो पहले ही उसके कमरे में ताला लगा दिया गया था। बाहर से ताला लगा दिया गया था। अब तो जब दरवाजा खोला तो बाहर से बंद वो अंदर छटपटाने लगी। गंगाधर ने अन्नपूर्णा का आकर के जो वो खड़बड़ाने लगी तो सोचा कहीं कोई बाहर ना सुन ले। तो दरवाजा खोला और अंदर जाकर उससे कहा अन्नपूर्णा तू इस भिक्षुक राह के भिखारी जिसके पास एक पैसा भी नहीं तो उसको अब भी पति मानती है हम लोगों के पास क्या नहीं हो रहा वो राज मंत्री है सब सुख भोगेगी काहे को भिखारी के साथ मरना चाहती है उसके हृदय में मानो कोई किसी ने छुरी मार दी हो उसने कहा कि तुम लोग कितने अभागे हो जो अपनी पुत्री के धर्म का नाश करना चाहते हो तुम पिता हो तुम्हें तुम्हें संकोच नहीं आ रहा ऐसा बोलते हुए कि मेरा पति है और तुम दूसरे पुरुष के पास जाने के लिए कह रहे हो।
अभी तक मैं क्षमा करती रही। ध्यान देना अगर मैं अपने स्वरूप में आ गई तो नष्ट कर दूंगी तुम्हें। पातिव धर्म में बहुत बड़ी सामर्थ है। आज वो क्रोधित होकर के बोली कि अरे तू पिता है। पति होते हुए मुझे व्यभचार के लिए आदेश कर रहा है। दूसरे पुरुष के लिए अगर मैं अपने स्वरूप में आ गई तो तुम सबको भस्म कर दूंगी। नष्ट कर दूंगी। कांप गए। पूरे परिवार के जन कांप गए। अब वह हाथ कांपते हुए जोड़ रहे हैं और कह रहे मुझे क्षमा करो। अब तो एक ही उपाय दिखाई दे रहा है। किसी तरह इसको घर से निकालो।
अपने पति के पास जाए नहीं ऐसा इतना उसका विकराल रूप देखा। दैवी शक्ति से संपन्न लोगों को लगा कि मैं भस्म हो जाऊंगा। हम सब नष्ट हो जाएंगे। उसने हाथ जोड़कर के कहा बेटी तू अपने पति के साथ जा। रघुनाथ का प्रभाव तो देख ही चुके जहर का भी प्रभाव अन्नपूर्णा का यह रूप देखकर साक्षात देवी शक्ति से संपन्न अब तो वो सब हाथ जोड़कर कहने लगे तुम जाओ अपने पति के साथ गंगाधर ने कुछ प्रसन्नता प्रकट करने के लिए अन्नपूर्णा को कहा कि ये धन ले लो उन्होंने कहा मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा एक कौड़ी धन नहीं चाहिए और अपने पति के चरणों में प्रणाम किया और कहा चलो प्रभु मुझे कोई सुख सुविधा मुझे किसी भी तरह के सांसारिक घर की जरूरत नहीं जहां आप हो आपके चरण ही हमारे लिए सब घर है।
अन्नपूर्णा पति के चरणों में प्रणाम करके उसके साथ चल दिया। शीघ्र चलिए। ऐसे पापियों के बीच में एक मिनट भी यहां नहीं रुकना। यह दासी हर तरह से तैयार है। हर कष्ट सहेगी पर आपके चरणों के समीप रहेगी। अब गंगाधर अपने लड़कों के साथ वापस आ गए। वो जय जगन्नाथ बोलकर के अपनी पत्नी के साथ जगन्नाथ पुरी की तरफ चलने लगे। अब इन पापियों को अब भी चैल नहीं पड़ा। विचार किया कि क्या किया जाए? अब क्या किया जाए? अब तो हमारी बात सब रद्द हो गई। अन्नपूर्णा की मैया ने कहा एक बात है मंत्री के लड़के को सूचना दे दो कि मैंने तो दिया लड़की तुम्हें अपनी।
तुम छीनना चाहो तो छीन लो मार डालो उसको भिखारी को और लड़की को ले जाओ। उसने तुरंत अपने पुत्रों को भेजा। पुत्र गए और मंत्री पुत्र से कहा कि ब्याह तो तुम्हारे साथ पक्का। हमने अपनी बहन दी। लेकिन वो एक भिखारी है। वो लिए जा रहा है। तुम्हारी जो पत्नी बनने वाली थी। अगर तुम बचा सकते हो तो छीन लो और उसे मार दो। भगवान ये बैर विरोध करने वाले भी किस मिट्टी से बने हैं? इनके हृदय में फिर भी शांति बेटी राजी जाने दो। लेकिन फिर अब तो वो दुष्ट था ही। गलत प्रवृत्ति वाला था।
राजमंत्री पुत्र था। उसने तत्काल सैकड़ों घुड़सवारों को आदेश किया अस्त्र शस्त्र से सुसज्जित हो जाओ। और एक घोड़े पर वो स्वयं सवार हुआ और चला। अब घोड़ सवारों की चाल और पैदल की चाल नगर के बाहर ही देखा कि वो आगे जा रहे हैं। पत्नी को लिए हुए रघुनाथ जी घोड़ों की टाप सुनकर के अन्नपूर्णा पीछे मुड़ के देखा तो सैकड़ों घुड़सवार और वो राजकुमार वो देखते ही डर गई और चिल्लाकर कहने लगी ये नीच बदमाश लोग आ रहे हैं। प्रभु कैसे रक्षा करोगे मेरी? अब वह चीख के राजकुमार बोला ए भिखारी इस सुंदरी को छोड़ो इस पर मेरा अधिकार है और मैं तुम्हें अभी नष्ट किए।
रघुनाथ ने पीछे मुड़ के देखा कि तो नजदीक ही आ गए। वो भक्तों का तो एक ही आश्रय है प्रभु। उसने अपनी पत्नी से कहा रघुनाथ जी ने कि अन्नपूर्णा तुम निर्भय रहो। हम जानते हैं जगदीश को बहुत कृपालु है। बहुत सामर्थ अरे बोले अब ये आ गए। देखो यह आ गए और ये आपको मारेंगे हमें ले जाएंगे। कैसे बच पाएंगे? बोले फिर भी आप निर्भय रहो। हम जानते हैं प्रभु हमारे बहुत लीला बिहारी है। बहुत सामर्थ्यशाली है। तुम्हें बिल्कुल नहीं डरना चाहिए। उसने कहा कि मैं आपको छोड़कर इन दुष्ट के साथ नहीं जाना चाहती।
ऐसे दुष्टों का एक क्षण भी हम संग नहीं करेंगे। प्रभु मुझे बचा लो। रघुनाथ जी जोर से हंसते हुए बोले तुम डरती क्यों हो? हमारे स्वामी की सामर्थ्य को तुम जानती नहीं हो। अब वो तो घबरा के श्री रघुनाथ जी का हाथ कस के पकड़े हुए हैं और उधर सामने से दो घोड़ सवार अत्यंत तेजस्वी अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित रफ्तार से बिजली की तरह चलने वाले घोड़ों में बैठे हुए हैं दो वो नजदीक आए इधर रघुनाथ के तरफ एक घुड़सवार इधर एक घड़सवार कहा तुम चिंता मत करो मैं तुम्हें देखकर ही समझ गया कि तुम विपत्ति में फंसे हुए हो हम दो के लिए पूरे त्रिभुवन के आ जाए घोड़सवार तो भी काफी है हम दो हम दो इनके के ऊपर भारी रहेंगे।
तुम चिंता मत करना। अब पीछे से वो जो मंत्री का पुत्र सैकड़ों हजारों घुड़सवारों के साथ था। उसने देखा कि लाखों घुड़सवार उसके साथ है। दो ही है और ये साक्षात नर नारायण भगवान है। और दिव्य अस्त्रों से सुसज्जित है। सर्वशक्ति संपन्न उसको दिखाई दिया कि लाखों घुड़सवारों ने आकर के सुरक्षा कवच बना लिया है रघुनाथ और रघुनाथ की पत्नी का। तो एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा। भयभीत होकर ही भाग गया। पूरी तक साथ गए। पूरी के तक साथ गए भगवान नर नारायण घोड़े पर सवार। अब तो एक अद्भुत आनंद दोनों के हृदय में।
इधर इधर दोनों तरफ सुरक्षा के स्वरूप में लिए हुए प्रभु चल रहे हैं अस्त्र-शस्त्र और बीच में रघुनाथ और उनकी पत्नी जब जगन्नाथ पुरी आई तब उन्होंने कहा तुम जाओ क्योंकि हमें दूसरे कार्य करने हैं और चिंता मत करना। जब कभी कोई आवश्यकता हो तो बुला लेना। आप जहां याद करोगे मैं आ जाऊंगा। तब तक वो समझ ही नहीं पाए थे कि थे कौन। जब चले गए तब समझ में आया कि ये तो भगवान नर नारायण थे। ये तो साक्षात भगवान करुणा करके आए। दोनों गए और जगन्नाथ पुरी में सिंह पौर पर रहने लगे।
अर्थात वही रात्रि में रहते जो भिक्षा मिलती पाते। किसी धनी मानी ने जब परिचय जाना कि सब कुछ छोड़कर के ऐसे आए हुए हैं। तो जगन्नाथ जी के मंदिर के दक्षिण की तरफ एक भवन खरीद दिया। दोनों पति पत्नी वहां रहने लगे और भगवन नाम कीर्तन करते हुए जीवन व्यतीत किया।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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