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भक्त खोजी जी का चरित्र | An AI Short Video | Pujya Premanand Govind Sharan Ji Maharaj

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पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से भक्त-चरित्र — पूरी कथा ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

एक बार चतुरदास जी नाम के महापुरुष अपने गुरुदेव की सेवा में रहते बड़े भाग्यशाली होते हैं जो गुरु की सेवा प्राप्त हो जाती है। बड़े भाग्यशाली होते हैं। रसिक गुरुदेव की सेवा तो श्री चतुरदास जी अपने गुरुदेव की सेवा में रहते थे। बड़े अहोभाग्य है जिनको गुरुदेव के आज्ञा पालन करने का सौभाग्य मिलता है। उनके पुण्य की क्या महिमा जिनको गुरुदेव आदेश करते आप ऐसा कीजिए अहो भाग्य अहो भाग्य जिन्हें गुरुदेव की आज्ञा मिल गई। इन्हीं का नाम खोजी जी पड़ा। चतुरदास जी का नाम खोजी जी पड़ा।

यह गुरुदेव जी के सेवा में अब जैसे गुरुदेव लघु शंका कर रहे तो पानी लिए खड़े हैं। गुरुदेव को हस्त प्रक्षाल आचमन आज्ञा कब क्या हो जाए तो जल की सेवा लिए खड़े थे। गुरुदेव जी लघु शंका में ही समीप बैठे। बड़ा भारी पीपल का वृक्ष दूर था तो वायु के द्वारा उसके फल और पत्ते बीज सब पड़े थे। लघु शंका किए और हंसने लगे और हंसते हंसते हाथ प्रक्षालन किया आचमन किया तो इतनी जोर की मस्त मुस्कुराहट और हंसी थी श्री चतुरदास जी ने जिनको खोजी जी बाद में कहा गया आचमन करा रहे थे कहा गुरुदेव कोई मधुर प्रसंग प्रभु का याद आया या कोई घटना घटी आप बहुत मुस्कुरा रहे हैं बहुत हंस रहे हैं इस समय बाह प्रसंग तो कोई ऐसा है नहीं कहा तू कैसा शिष्य है रे सेवा में रहता है मेरी हंसी का कारण नहीं जान पाया मैं क्यों हंसा इतना भी तुझे ज्ञान नहीं और मेरी सेवा में

रहता है कैसा शिष्य है जो गुरु के मन की बात ना जान पावे गुरु के इशारे को गुरु के मनोभाव भाव को ना जान पाए शिष्य क्या चलो सेवा छोड़ो मैं क्यों हंसा इसकी खोज करके आओ अब बताओ गुरुजनों के प्रति सेवा कर बहुत कठिन है बहुत कठिन है यहां कहा कि छोड़ो सेवा मैं क्यों हंसाए बताओ आके खोज करो अब गुरु आज्ञा तुम्हारी बुद्धि अब सेवा के अधिकारी नहीं यदि तुम ये नहीं जान सकते मैं क्यों हंसा हसे गुरु जी और फसे चेला जी आप समझो मतलब कितना कठिन विषय है गुरु सेवा बहुत कठिन यही तो अमोघस जो जीत गया अमोघस तुम्हारी बुद्धि विवेक रहित है जब तक तुम हमारे हंसने का कारण ज्ञात करके ना आओ तब तक तुम्हें हमारे पास कभी नहीं आना चाहिए चलो जाओ यहां से आश्रम से हमारे मन की बात जब जान जाओगे कि मैं क्यों हंसा उसका कारण सही बताओगे आकर के और जो मैं मन में सोच रहा था तो फिर सेवा में रख लूंगा तब मैं मानूंगा कि तुम मेरे सच्चे शिष्य हो और सेवक हो साष्टांग दंडवत किया जो आज्ञा गुरुदेव अब चल दिए जहां संत महात्मा मिलते तो विनम्रता पूर्वक

दंडवत करते कहते हमारे गुरु जी लघु शंका करते समय हंस दिए। क्या कारण था? सब कहते गीता की बात पूछो, भागवत की बात पूछो, वेदों के तुम्हारे गुरु जी है तो लघु शंका में हंस दिया। हम इसका क्या मतलब बताएं तो और उपहास होता। भला कोई इस प्रश्न का क्या उत्तर दे? कोई सुलझे हुए महात्मा थे। उन्होंने कहा रामायण, गीता, भागवत का प्रश्न हो तो अभी मैं उत्तर दे दूं। लेकिन आपके गुरु जी लघुशंका करते हुए क्यों हंसे? इसका हमको ज्ञान कैसे होगा? हम कैसे उत्तर दे आपको? यह तो गुरु जी से ही पूछो जाके।

बोले नहीं गुरु जी ने कहा जब तक इसका उत्तर ना मिल जाए हमारे सामने मत आना। मुख मत दिखाना। अरे संत जन बहुत पहले और हर उनकी आज्ञा में बहुत बड़ा रहस्य होता था। अब ये रोज जलते कि गुरु सेवा से वंचित हो गया। गुरु सेवा छूट गई। साधक को इस बात की बहुत पीड़ा होनी चाहिए। जिसको गुरु सेवा तो यह होना चाहिए कि कौन सा अपराध बन गया। दुर्भाग्य आ गया कि गुरु सेवा छूट गई। वो रात दिन जलते इसी प्रकार और संतों से जाकर पूछते पर कोई समाधान नहीं मिला। अब उन्होंने विचार किया गुरु जी के सामने जाना नहीं सेवा है नहीं तो अब शरीर को रख के क्या करें?

शरीर को नष्ट कर देते हैं। शरीर का परित्याग कर देने की ठानी कि अब शरीर रख के क्या करें? गुरु जी ने सेवा से निकाल दिया। उत्तर मिल नहीं पा रहा तो शरीर किस काम का है? अब वो एकांत में निर्जन वन में जाकर बैठ गए और नाम जप करने लगे और सोचा बस भूख प्यास से पीड़ित होकर यही शरीर छोड़ दूंगा। कुछ खाना नहीं, कुछ पीना नहीं। रात दिन भगवान नाम जप करना शरीर छोड़ दूंगा। गुरु की आज्ञा पर थे। जिज्ञासा प्रबल थी। सेवा छूट गई थी। पीड़ा बहुत थी। अभी कुछ ही दिन हुए थे। ना अन्न ना जल रात दिन नाम जप और शरीर छोड़ने का संकल्प महामहिम कबीर दास जी प्रकट हुए कहा ए भाई आंख खोलो आंख खोला तो देखा कबीर दास जी साष्टांग दंडवत किया हां क्या प्रश्न है तुम्हारा क्यों इतना कष्ट सह रहे हो इसका मतलब समझ रहे हो जब कोई सच्ची भावना से भगवान का भजन करता है तो भगवान अपने दिव्य पार्षदों को भेज देते हैं समस्या का समाधान।

सुनो जब तुम्हारे गुरु जी लघुशंका कर रहे थे तो उनके लघुशंका की धाल में पीपल का बीज बह रहा था। बीज को बहते हुए लघुशंका में देखकर गुरु जी विचार करने लगे कि ओो देखो इस बीज में पीपल का पूरा वृक्ष छुपा हुआ है। लेकिन जब यह बीज पीपल में था तो कितना बंधनीय और कहां सुव्यवस्थित था और जब ये पीपल से अलग हुआ तो लघु शंका में बह गया। इसका मतलब पीपल का वृक्ष साक्षात ब्रह्म है। और उसका अंश जीव है। जीव जब अविद्या के कारण ब्रह्म से अलग हो जाता है तो मलमूत्र के द्वारों में बह जाता है आसक्ति होकर और अगर वह ब्रह्म से जुड़ा रहे तो ब्रह्म में पूजनीय और ब्रह्ममय हो जाता है।

ब्रह्मवि ब्रह्म भवती कबीर दास जी ने व्याख्या करके बताई कि जब वो ब्रह्म से जुड़ा रहता है तो ब्रह्ममय रहता है। जब ब्रह्म से अलग हो जाता है तो मलमूत्र के शरीर में आसक्त होकर मलमूत्र के द्वारों के भोगने में पूरा जीवन नष्ट कर देता है। जीवात्मा जब प्रभु से विमुख हो जाता है तो उसकी यही दुर्गति होती है। जैसे पीपल के वृक्ष से फल से वो बीज अलग हो गया तो लघु शंका के प्रवाह में बह गया। नहीं तो इतना महान वृक्ष उसमें छिपा हुआ है कि अगर उसे सुव्यस्थित किया जाए।

अरे मेरे गुरु जी के हंसने का इतना गढ़ रहस्य खोजी जी का संशय मिट गया और गुरुदेव के पास आए साष्टांग दंडवत किया उनका उत्तर कहा गुरुदेव महामहिम श्री कबीर दास जी ने ऐसा ऐसा ऐसा बताया गुरुदेव पुनः मुस्कुराए और कहा एक प्रश्न कृष्ण ने तुम्हें सिद्ध बना दिया क्योंकि सिद्ध महापुरुष का दर्शन सिद्ध ही बना देता है। अब आज से तुम हमारे समान सिद्ध हो गए हो। अब तुम आज से हमारे मन की सारी बातें जान लोगे। शिष्य के मन की बात जान लेना तो हर सिद्ध पुरुष का लेकिन अपने गुरु के मन की बात जान लेना बहुत बड़ी बात होती है।

कुछ समय बाद खोजी की बड़ी महिमा प्रकाशित हुई। गुरु भक्त थे। आज तक किसी को कहीं भी अगर विशेष कृपा प्राप्त हुई तो गुरुदेव के बल से खोजी जी के गुरुदेव का जब अंतिम समय आया भगवत चिंतन परायण रहते थे। उन्होंने एक घंटा बांध दिया और कहा जब मेरा मोक्ष हो जाएगा तो घंटा बज जाएगा। जब मेरा भगवत मिलन हो जाएगा तो घंटा बज जाएगा। शिष्यों से कहा घंटा स्वयं बजेगा जब मेरा शरीर छूटेगा भगवत प्राप्ति होगी। परंतु आश्चर्य हुआ गुरु जी का शरीर तो छूट गया पर घंटा नहीं बजा। सब जितने और शिष्य थे बहुत चिंता में हो गए कि क्या गुरु जी की गति नहीं हुई?

गुरु जी कह रहे थे जब मेरा गति हो जाएगी भगवत प्राप्ति हो जाएगी शरीर छूटते ही तो घंटा बज जाएगा लेकिन घंटा तो बजा नहीं और गुरु जी के वचन परम सत्य इसका मतलब गुरु जी को भगवत प्राप्ति नहीं हुई भ्रमण में गए थे कुछ समय बाद खोजी जी आए तो बड़ी समाज में उदासीनता थी शिष्यों में सब और खोजी जी से कहा गुरु जी की सद्गति नहीं हुई क्यों गुरुजी गुरु जी तो स्वयं ब्रह्म स्वरूप है। बोले उन्होंने घंटा स्थापित किया था कि जब शरीर छूटेगा भगवत प्राप्ति होगी तो घंटा बज जाएगा।

तो घंटा तो बजा नहीं तो गुरु जी के वचन असत्य नहीं हो सकते। मतलब गुरु जी का मोक्ष नहीं हुआ। खोजी जी कहां गुरु जी का शरीर छूटा था। बोले आम के पेड़ के नीचे गए जहां गुरु जी लेटे थे मुझे बताओ। बोले यहां लेटे थे। लेट गए और सामने देखा तो एक पका हुआ आम था ऊपर। उनका कहा इस आम को तोड़ो। आम को तोड़ा और जे उस आम को चीरा तो एक कीड़ा निकला। और बस वो कीड़ा अंतर्ध्य हुआ सो घंटा बज गया। कीड़ा अदृश्य हो गया और घंटा स्वयं बज गया। बहुत विचित्र बात है। भला इतने सिद्ध महापुरुष क्या इनकी गति में अंतर आमने डाल दिया?

बोले हां दो इसके भाव प्रकट किए। बोले इसके दो भेद हो गए। पहला जिसके शिष्य इतने सिद्ध हैं उनकी गुरु की भला गति बिगड़ जाएगी पर दिखाया दो भाव इसमें प्रकट किए गए हैं। पहला दिखाया गया चंचला ही मना कृष्णा प्रमाद बलव दृढ़म तस्याहम निग्रह मनने वायर सुदर्करम ये मन बड़ा चंचल है प्रमथम स्वभाव वाला है बड़ा बलवान है इसको वश में करना मानो तूफान को रोकने के समान है मन को बहुत संभालना कठिन है | कह रहे सुमेर पर्वत को कोई उखाड़ सकता है 4 लाख योजन का पर मन को बस में नहीं कर सकता इतना बलवान बन कोई बिजली को हाथ से पकड़ सकता है पर मन को नहीं पकड़ा जा सकता बहुत विचित्र चंचलता है इस मन की इसको हल्के में ना ले इतने सिद्ध महापुरुष और जब उनका का अंतिम समय तो पका हुआ आम देखा।

पके हुए आम में मन चला गया। कहीं भी बल फस सकता है। इतने सिद्ध महापुरुष आम में तो घंटा नहीं बजा। यह पहला जन साधारण के लिए और असाधारण बात थी कि आम में तो मन गया पर वैष्णव का मन स्वयं भोगता होता नहीं वो तो कोई भी अच्छी चीज देखे तो भगवान में तो तत्काल भगवान का ध्यान किया कि अब असमर्थ हूं शरीर छूटने वाला है ये आम बहुत बगीचे का हमारे सुंदर था हम सोचते आपको भोग लगा देते इसी सोच में प्राण निकल गए तो भगवान ने अंतिम इच्छा पूर्ति करने के लिए कीट रूप धारण करके आम पाने आ गए तो भगवान से मिलन हुआ नहीं जब आम को छेदन किया और वह भगवान अंतर्ध्य हुए तब जाकर खोजी जी से मिले तो घंटा बज गया इसका आंतरिक रहस्य बताया तो यहां यह बताया गया कि मन बड़ा चंचल है भगवत प्राप्ति करने वाले उपासक को कहीं भी अपने मन की वृत्ति ना अटक जाए इसमें अंतिम तक सावधान रखना है अंतिम तक कभी भी फस सकती है।

और दूसरी बात है जिसका स्वभाव बन गया हर वस्तु हर व्यक्ति में भगवान का दर्शन भगवान को समर्पण तो उसकी दुर्गति नहीं हो सकती। तीसरी बात जो गुरुदेव की शरण में रहकर गुरुदेव की आज्ञा अनुसार चलते हैं। आपको सच्ची बतावे गुरु अपने से भी ऊपर महिमाशाली उसे बना देता है। इस प्रसंग से समझिए कि अगर खोजी जी को गुरुदेव ने आज्ञा दी तो सिद्धों के परम सिद्ध बना दिया अपने शिष्य को। इसलिए चाहिए कि अपने गुरुदेव की आज्ञा में संपूर्ण जीवन समर्पित करते हुए प्रियाल के नाम रूप लीला धाम में निरंतरित को लगाए और इसी जन्म में भगवत प्राप्ति करें।

विशेष चर्चा आगे श्री राधा वल्लभ लाल की जय

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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