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सिलपिल्ले बाई जी की कथा | An AI Short Video | Pujya Premanand Govind Sharan Ji Maharaj

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पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से भक्त-चरित्र — पूरी कथा ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

नामावली का जब गान करते हैं तो शिलपिले बाई का स्मरण आता है। उसमें सुत विष दियो पूज सिलपिले भक्ति रसीली पाए। देखो कितना विश्वास होता है भक्त को। कैसा वो श्रद्धावान होता है। एक राजकुमारी और दूसरी एक जमींदार की पुत्री। दोनों को मित्रता थी। एक दिन राजा के यहां भगवत प्रेमी महात्मा आए। वो संत सेवी राजा थे। महात्मा जन आते रहते थे। और महात्माओं का कार्य ही होता है निरंतर अपने प्रभु की सेवा और सुमिरन में मगन रहना। सेवा सुमिरन यह बहुत बड़ी सामर्थ्य है। अगर हम हर समय सेवा और सुमिरन में रहे तो कभी कोई माया प्रपंच हमें परास्त नहीं कर सकता।

जहां हम सेवा सुमिरन से अलग हुए वही माया का प्रभाव पड़ता है। भगवान का शालिग्राम स्वरूप उनके पास था। खूब भाव से सेवा कर रहे थे। और नवीन अवस्था की कोमल हृदय वाली यह दोनों सखियां देख रही थी। इनके मन में आया ऐसे हम भी ठाकुर सेवा करेंगे। देखने से सुनने से हमारे हृदय में प्रभाव पड़ता है। गंदी बातें देखेंगे। गंदी बातें सुनेंगे। उसी का चिंतन होगा। हृदय गंदे आचरणों की प्रेरणा वाला बन जाएगा। अगर हम भागवतिक बातें सुनेंगे, भागवतिक दर्शन करेंगे तो भागवतिक चिंतन होगा।

हृदय भागवतिक प्रेरणा वाला बन जाएगा। कई दिन संत भगवान रुके रोज सेवा कीर्तन कथा सरल हृदया। उन दोनों सखियों में बात आई कि चलकर के संत भगवान से कहते हैं हमको भी ठाकुर जी दीजिए। दोनों ने चरण पकड़ कर प्रार्थना की। गुरुदेव हमारे हृदय में भी इच्छा हो रही कि हमें ठाकुर सेवा मिले। अब दोनों बच्चे ही थे। संत भगवान ने विचार किया सेवा पद्धति में बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है। अभी ये बच्चे हैं। कहीं सेवा अपराध ना बन जाए। सेवा पर आदमी होता है। अब इतना दृढ़ विश्वास कि यह बच्चे हैं सेवा भाव कैसे पूर्ण कर पाएंगे?

तो उन संत भगवान ने दोनों बच्चियों से कहा कल ठाकुर जी लाएंगे हम आपको दे देंगे। तो गांव में घूमे तो आसपास गोले गोले से पत्थर मिले। पत्थर लाए दो और कहा कि ये लो तुम्हारे ठाकुर जी दोनों को दिया। देखो गुरु वचनों पर और गुरु प्रदत्त सेवा वस्तु पर कितना भाव होना चाहिए। उन्होंने दृढ़ विश्वास किया कि मुझे भगवान गुरुदेव ने दिया। ये भगवान है मेरे। दोनों ने अपने हृदय से लगाया। अब एक जमीदार की पुत्री थी। एक राजकुमारी स्वर्ण के सिंहासन में और उनका नाम रखा सिलपिले ठाकुर।

सिल म पत्थर तो उनका तुम्हारे ठाकुर का नाम सिलपिले गोविंद है। दोनों सिंहासन पर रखकर आराधना कर दी। भाव प्रतिपल बढ़ता गया। नाम निरंतर जप गुरु प्रदत्त ठाकुर पर विशेष चमत्कार हृदय में प्रकट होता है। यदि उन्हीं की नियमावली से चलो अपने मन से बाजार से खरीद लाए विराजमान किए हैं कभी सेवा की कभी नहीं की वो भी अच्छा है। कम से कम भागवतिक भाव तो है लेकिन सिद्धि जो प्राप्त होती है वो गुरु कृपा से गुरु प्रदत्त ठाकुर से जैसे धनन्ना जी को भांग के बट्टे में ठाकुर जी प्रकाशित हो गए गुरु प्रदत्त अब यह सखियां जब बड़ी हुई तो इनके ब्याह की बात है।

तो जो राजकुमारी थी उनका राजकुमार से किसी से ब्याह तय हुआ। ब्याह हो गया। अपने माता-पिता से जब विदाई ली तो अपने ठाकुर जी को जो सिंहासन में थे। सिंहासन सहित एक सुंदर पेटी में ऐसे और गोद में रखकर और अंदर ही अंदर जल रहे हैं कि प्रभु मैंने प्रीतम आपको माना है। संसार के व्यवहार में यह प्रीतम बना हुआ है। पर प्रभु हमारे प्रीतम दो नहीं हो सकते। हमने हृदय से आपको माना। इसी विचार में वह बड़ी उदास है। पहले पालकियों में ऐसा राज सैनिक चल रहे हैं। पालकियों में वो बहू जा रही है और राजकुमार घोड़े पर राजकुमार बार-बार पालकी के समीप जाता दर्शन करने की इच्छा होती है ना।

तो उदास देखता मन में बड़ी ग्लानी हुई। उसने कहा एक नदी थी। उसने कहा यहां हम थोड़ी देर विश्राम करना चाहते हैं। राजकुमारी की पालकी रखी जाए और सैनिक दूर खड़े हो। वो राजकुमार वैसे ही आज्ञा हुई तो बात करना चाहते हैं। पर वो ना देखती है और ना बात करती है। और इतना सुंदर रूप क्योंकि ब्रह्मचारिणी और भगवत आराधना। अब उसके हृदय में जलन हुई कि ऐसा क्या है जो हमसे बात नहीं कर रही। बस बार-बार ऐसे पिटारी खोल के ऐसे ठाकुर जी को देखती। नाम जप और सेवा के प्रभाव से वो शील नहीं रह गया था।

वहां उसको सांवरे श्याम सुंदर की झांकी मिलती थी। जब अपने शिल्पिल्ले ठाकुर जी को देखती तो ललित त्रिभंगी श्री लाल जो महाराज श्याम सुंदर दिखा अत्यंत आसक्ति गुरु प्रदत्त किसी भी शब्द में किसी भी वस्तु में दिव्यता होती है बस हमारी भावना होनी चाहिए अरे बोले ये हम नहीं दे सकते ये गुरु प्रदत्त है नहीं हम प्राण दे सकते हैं लेकिन ये नहीं जिसका गुरु वचन पर गुरु प्रदत्त वस्तु पर गुरु प्रदत्त ठाकुर पर दृढ़ निष्ठा हो गई। वही सिद्ध हो जाता है। अब उसने समझ लिया कि पिटारी में जो कुछ है यही हमारे और राजकुमारी के बीच में बाधा है।

दो चार दासियों को बुलाया और कहा इनको बातों में अलझाओ पिटारी पीछे हमें दो। वो प्रवीण दासियां उनको विनोद भाषा में हंसी मजाक में बात लेकिन वो उदासीन धीरे से गोद में पेटी थी ले ली। हम लिए हुए हैं। आप बातचीत में पेटी उनको दे दी। राजकुमार ने राजकुमारी से कहा यही पेटी तो हमारे आपके बीच में बांध फेंक दी नदी में। अब तो उसके हृदय में पीड़ा हुई। भारी व्या अब राजकुमार है। सैनिकों के साथ तुरंत पालकी उठवाई। मैं ले गया। पर वो आसक्त है। इतनी सुंदर राजकुमारी क्योंकि भागवतिक तेज से संपन्न में आकर्षण होता है।

राजकुमारी ने कहा यदि हमारे ठाकुर नहीं तो मैं नहीं आज से अन्न जल त्याग प्राण त्याग दूंगी अगर हमारे ठाकुर जी हमारे समीप नहीं तो आज से एक बूंद पा कैसे पिए अपने ठाकुर को भोग लगा के पाला है और ठाकुर जी फेंक दिए गए भारी व्याकुलता जैसे मीरा जी कहते दृश्य बिन दुखन लागे नहीं ना रात में नींद है ना दिन में अन्न जल है व्याकुलता अब भयभीत हो गया राजकुमार। पूरा महल इस विषाद से हो गया कि अगर नवीन राजकुमारी प्राण त्याग देती है तो क्या होगा लोक समाज में कि अभी नवीन राजकुमारी गई।

यह लोग ऐसे निर्दयी है कि ऐसा व्यवहार किया कि उसने प्राण त्याग दिया। राजकुमार घुटने में आ गया। घुटने टेक कर राजकुमारी से कहा मैं तुम्हें दुखी नहीं करना चाहता। पर मैं तुमको छोड़ भी नहीं सकता। अब हमें आप वह उपाय बताओ जिससे आप मुस्कुरा दो। आप प्रसन्न हो जाओ। तो उन्होंने कहा हम अपने ठाकुर के बिना जीवित नहीं रह सकती। यदि आप हमें जीवित देखना चाहते तो हमारे ठाकुर जी ला के दो। ठाकुर जी को नदी में फेंक दिया था। पारिवारिक जनों के साथ राजकुमार उस नदी के तट पर गए।

और राजकुमारी से कहा तुम्हें इतना प्रेम ठाकुर जी से तो तुमसे ठाकुर जी कितना प्रेम करते हैं? अगर तुमसे ठाकुर जी प्रेम करते हैं तुम मुझे प्रमाणित कर दो तो मैं जीवन भर तुम्हारी आज्ञा में रहूंगा। अच्छा तो तुम यह देखना चाहते हो कि ठाकुर जी हमसे कितना प्रेम करते हैं। हाथ फैलाया और आर भाव से पुकारा कि गोविंद अब आपके बिना मैंने जीवित नहीं रहना। अंदर से जे ही प्रार्थना की तो जल से सिंहासन सहित मिल भगवान जैसे कोई वायु के प्रवाह में आ रहा हो ऐसे आए और छाती से चिपक गए।

पूरा परिवार राजकुमार यह देख रहा था। हृदय से ठाकुर जी जीवन भर के लिए दासत्व स्वीकार कर लिया और कहा जैसी आप आज्ञा करोगे जैसे मीरा जी जब राणा जी से ब्याह हुआ तो प्रथम मिलन की रात में मीरा जी ने कहा सावधान तुम हमारे पति नहीं हो मेरा सुहाग गिरधर से है श्याम सुंदर ही मेरे पति हैं व्यवहार में तुम पति बने हो। यदि हमारी बात समझ पा रहे हो तो जीवन में कभी हमारा स्पर्श मत करना। यह जीवन केवल गिरधर के लिए दूसरे के लिए नहीं। उतर गए सैया से और जैसे सेवक होता है।

बोले अहो भाग्य मुझे सौभाग्य मिला कि इतनी महा भाग्यवती की सेवा करने का एकांत में मैं सदैव तुम्हारे शिष्य की तरह बर्ताव करूंगा। पर समाज में तुम्हें बहू की तरह बर्ताव करना होगा। नहीं तो लोग जीने नहीं देंगे। समाज में पत्नी की तरह और एकांत में गुरु शिष्य के तुम हमारी गुरु होगी और हम ऐसा ही बर्ताव राणा जी ने ऐसा ही उस राजकुमार ने दिया। हमारी भागवतिक निष्ठा ऐसी होनी चाहिए कि जो गुरु जी ने मंत्र दिया है, जो गुरु जी ने उपासना दी है, उसमें दृढ़ विश्वास होना चाहिए।

हमारे अंदर किंचिन मात्र फिसलाव नहीं होना चाहिए।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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