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चौथी लीला:वृन्दावन सत लीला भाग - 5

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रसिक वाणी की व्याख्या (हित वार्ता) — ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

सक तो वृंदा विपिन बस छिन छिन आयु विहात एसो समय ना पाइए भली बनी है बात हो सके तो वृंदावन आकर बस क्योंकि क्षण क्षण आयु निकलती चली जा रही है। इतना सुंदर समय बना है। इतनी सुंदर बात बनी है। कोशिश कर वृंदावन आकर बस छाण स्वाद सुख देह के और जगत की लाज मन ही मार तन हार के वृंदावन में गाज छाण के स्वाद सुख इस देह के और जगत की लाज जगत की लज्जा के लोग क्या कहेंगे यह सब छोड़ के मन ही मार मन को मार के तन को हार के वृंदावन में रहे वृंदावन के बसत ही अंतर जो करे आन ते सम शत्रु ना और को मन वच के यह जान वृंदावन के बसने में जो अंतर करे कि नहीं अभी नहीं वृंदावन जाना अभी यह नहीं करना अभी यह नहीं करना अभी भजन में नहीं पढ़ना यह नहीं करना उसके समान कोई शत्रु नहीं है मन से वचन से यह जान ले वृंदावन के वास को जिनके ना हु लास माता पितृ सुतादती तज ध्रुव तिन को पास वृंदावन के वास का जिनके हृदय में हुलास नहीं है उत्सुकता नहीं है वो माता वो मित्र वो पुत्र वो पत्नी ध्रुव उनका संग छोड़ दे और देश के बसत ही अधिक भजन जो हो ए सम नहीं पूजत तऊ वृंदावन रहे सोई और देश के बसते हुए अगर अधिक भजन हो रहा है जैसे माना कि हम मुंबई के रहने वाले हैं।

वहां रह के 24 घंटा में से 10 घंटा हम भजन कर रहे हैं। अधिक भजन जो होए यह सम नहीं पूजत तऊ वृंदावन रहे सो और वृंदावन में केवल 10 मिनट हो रहा है भजन तो उसके समान वह भजन नहीं है।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Hit Vaarta (YouTube)

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