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नल-दमयंती जी की कथा(Part-1) | An AI Short Video | Pujya Premanand Govind Sharan Ji Maharaj

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पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से भक्त-चरित्र — पूरी कथा ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

सुनाते हैं मन में कष्ट किसे कहते हैं। महाराज नल का प्रसंग युधिष्ठिर जी को सुना रहे हैं। बड़ा धार्मिक प्रसंग है और शिक्षास्पद प्रसंग है। महाराज नल इसमें वर्णन है। भगवान व्यास देव जी वर्णन कह रहे हैं। महाराज नल सर्वगुण संपन्न है। भलीभांति जब तक ब्याह नहीं हुआ ब्रह्मचर्य का पालन किया। महाराज नल ब्रह्मचर्य से रहते थे। चारों वेदों को कंठस्थ किए हुए थे। पंचम वेद स्वरूप समस्त इतिहास और पुराणों का गुरुकुल में रहकर अध्ययन किया था। सब धर्मों के ज्ञाता थे महाराज नल।

और जब वहां से अपने घर आए तो पंच यज्ञों के धर्म के अनुसार संपूर्ण देवताओं का नित्य होम करते हैं। हवन के द्वारा बल वैश्य दे और पंच यज्ञों की आहुति अपने लोग जब नैष्टिक ब्रह्मचर्य में थे तो ये सब आदेश थे गुरुजनों के ये सब करते थे अहिंसा परायण सदैव सत्य बोलते दृढ़ता पूर्वक जो नियम लेते उसका पालन करते ऐसे तेजस्वी थे कि दक्षता धैर्य ज्ञान तपस्या सोच शम दम यह स्वयं उनमें निवास करते थे। ऐसे राजा नल के प्रभाव को देखकर के कलयुग ने कहा हमारे राज्य में ऐसे को सुखी नहीं रहना चाहिए।

दमयंती जी जैसे नल जी ब्रह्मचर्य से रहते दमयंती जी जिनके साथ इनका पाणिग्रह संस्कार हुआ। ब्रह्मचर्य से रहती थी। देवी स्वरूप है। सत कार्यों का अनुष्ठान ब्रह्मचर्य से रहना और जब ब्याह के योग्य हुए तो इन्होंने धर्मात्माओं के मुख से महाराज नल के रूप सौंदर्य धर्मात्मा होने की बात सारे गुणों की बातें सुनी तो मन में निश्चय कर लिया कि अगर पति रूप से वरण करूंगी तो महाराज नल को बड़ा प्रसंग है। हम उधर पीछे नहीं जाते। देवताओं में लालसा प्रकट हो गई कि ऐसी निष्ठावान राजकुमारी का वरण तो जो देवी स्वरूपा है।

हम देवताओं को चाहिए। देवता गए। जब उनको पता चला कि महाराज नल के प्रति इनकी आसक्ति है तो सब ने नल रूप धारण कर लिया। नल जी को भी निमंत्रण गया था। यह भी गए थे। पर इस पांच देवता जो थे उनको प्रणाम करके कहा मैं आपका दास हूं। मेरा जीवन आपके चरणों में समर्पित है। मैं ऐसे कभी गलती नहीं कर सकता कि आपके आगे स्वयंवर में मैं खड़ा हूं। तो उनका हम तुम्हारी इस दैन्यता से और इस प्रार्थना से प्रसन्न है। हमारा आदेश है। तुम खड़े होइए और वो जिसका वरण करेगी वही ले जाए।

दमयंती के सामने नल नल नल नल दमयंती ने कहा मन वचन कर्म से हमने कभी धर्म का उल्लंघन नहीं किया तो हे देवताओं आप ही मुझे बताओ कि मेरे असली नल कौन है इनमें से तत्काल हृदय में आया कि देवताओं की छाया नहीं होती और मनुष्य रूप में छाया होती है तो जिस नल में छाया पड़ रही थी जिस शरीर की जयमाला होने के सब देवता प्रसन्न हो गए कि हम तुम्हारी पातिव्रत धर्म निष्ठा पर प्रसन्न है कि जिसका वरण किया उसी के गले में माला डाली। यही तुम्हारे धर्म की परीक्षा थी। कलयुग इनके इस प्रभाव को देखकर कि देवता भी जिस स्वयवर के लिए गए उसमें इनकी विजय हुई।

इतना धर्मात्मा गुणवान है। ईर्ष्या हो गई। कलयुग को ईर्ष्या हो गई। जब देवता लोग वापस हो रहे थे तो कलयुग ने कहा कि यह मैं कभी सह ही नहीं सकता कि हमारे राज्य में कोई इतना गुणवान धनवान धर्म से चलने वाला सुखी रहे मैं इसको हर तरह से रौंद दूंगा। कलयुग ने कहा देवताओं ने कहा तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिए। धर्मात्मा पुरुष बोले आपका काम हो गया। आप जाइए हम अपना काम शुरू करते हैं। इसको किसी काम के लायक नहीं रखेंगे। इसको नष्ट कर देंगे। कलयुग ने कहा मैं अपने क्रोध का उपसंगार नहीं कर सकता।

अब मेरा चमत्कार देखना इसकी खोपड़ी में बैठता हूं इसी राजा की और इसका सर्वनाश करता हूं। मैं इनके भीतर निवास करूंगा। इनको राज्य से वंचित करूंगा। इनको इनकी पत्नी से वंचित करूंगा। सुखों से वंचित करूंगा और सर्वनाश कर दूंगा। इस प्रकार कलयुग ने उन देवताओं से कह के महाराज नल के पीछे चल पड़ा। पर वो स्पर्श नहीं कर सकता था। क्योंकि कहीं भी अधर्म आचरण नहीं था। बिना अधर्म आचरण के कलयुग किसी को स्पर्श नहीं करता। उसकी सामर्थ्य ही नहीं है। अब वह नल के दोष देखने के लिए तत्पर रहता।

कोई गलती ऐसी मिले धर्म विरुद्ध जिससे मैं इसके अंदर प्रवेश कर जाऊं और इसका नाश कर दूं। 12 वर्ष बीत गए। कोई भी गलती नहीं मिली। एक कुमार, एक कुमारी का जन्म भी हुआ। 12 वर्ष हो गए। एक भी गलती नहीं मिली। एक दिन किसी राज कार्य से बहुत शिथिल थे। संध्या का समय था सूर्य अर्घ देने का तो लघु शंका गए हाथ धो लिया पर ना चरण धोए और ना आचमन किया और अर्घ में बस छिद्र मिल गया कलयुग को प्रवेश करने का दोष मिल गया और आविष्ट होते ही बुद्धि बदली नशा जैसे चढ़ता ना कलयुग का आवेश होते ही बुद्धि बदल जाती है।

उधर एक पुष्कर थे जो इनके कजन भाई थे पर राजा ये बने हुए थे। बड़ा राजा होता था। उसके पास कलयुग उनकी बुद्धि में प्रवेश करके विचार करवाने लगा। कि मेरा भी तो अधिकार राज्य पे है। यह बड़ा है तो राजा हो गया तो क्या फसाया जाए इसको? अभी तक नहीं था। जाकर ललकारा कि तुम बहुत बड़े राजा बनते हो। हमारे साथ जुआ खेल लो। महाराज नल विचार शून्य हो गए थे क्योंकि कलयुग का प्रवेश हो गया था। राजा नल कुछ सोचने विचारने की सामर्थ्य रहित हो के कहा कि यदि धर्म पूर्वक जुआ खेलोगे तो हम तुम्हारे साथ खेलेंगे।

जुआ कहीं धर्म पूर्वक होता है क्या? जुआ में छल और कपट का राज्य होता है। द क्रीड़ा के लिए पुष्कर ने आवाहन किया। राजा नल जुआ खेलने लगे। बुद्धि में कलयुग का प्रवेश हो गया था। राजा नल हारते चले जा रहे हैं। जुआ का एक जोश होता है। जितना हारता उतने उसके अंदर और जीतने की लालसा प्रबल होती है। सब रत्न हार गए, स्वर्ण हार गए, राजकीय वाहन हार गए, बहुमूल्य वस्त्रों को दांव पर लगा दिया। कुछ भी अब ऐसा नहीं दिखाई दे रहा है कि जो लगाएं महल भी दांव में लगा दिया अब वो जुआ है और इस समय कलयुग का संकल्प है इनको नष्ट करने का तो वही पासा पड़ता है पुष्कर के हाथ में जिससे राजा नल हार जाए एक भी बार नहीं जीते पर जोश इनका बढ़ता चला गया सारथी ने महल में जाकर के दमयंती से निवेदन किया कि समस्त पूर्ववासी लोग आपसे प्रार्थना करना चाहते हैं।

आपकी ही बात महाराज मान सकते हैं। रोक दीजिए इनको नहीं तो नष्ट हो जाएगी। पूरी प्रजा नष्ट हो जाएगी। अगर पुष्कर राजा होगा तो दुष्ट स्वभाव का है। ऐसे धर्मात्मा राजा को परास्त करके जुए के द्वारा अगर वह राजा बना तो प्रजा दुखी हो जाएगी। महाराज भावी संकट को ना देख के केवल जुए में मगन हो रहे हैं। ठीक नहीं है। द क्रीड़ा में दमयंती बहुत शोकित हुई कि अपने पति को हम आदेश करें। ऐसा हो नहीं सकता। पर ऐसी परिस्थिति में मुझे निवेदन करना चाहिए। द्वारपालों से कहा कि जाकर के महाराज से प्रार्थना कर दो।

उनके चरण दर्शन करना चाहती और कुछ निवेदन करना चाहती। कितना धर्म है। अब जाकर के बार-बार वहां कह रहे हैं दमयंती जी आपसे निवेदन कर रही हैं। वो आपसे मिलना चाहती है। उनको सुनाई नहीं दे रहा। बस पासे पर मनोवत्ति लगी हारने पे। दमयंती ने देखा कि महाराज तो उन्मत हो गए हैं। असावधान है। भय और शोक दोनों का त्याग कर अपने पति का हित करना पत्नी का परम कर्तव्य होता है। अगर महाराज का सब कुछ छीन गया तो महाराज संकट में पड़ जाएंगे। इसलिए अब मुझे यह मर्यादा नहीं रखनी चाहिए कि वो आदेश दे तब उनके पास जाए।

अगर स्वामी संकट में फंसने वाले हैं तो उनके आदेश की जरूरत नहीं। अपने में शरीर से वचन के द्वारा या जैसे भी बने संकल्प के द्वारा उनको संकट से निवृत्त करना सेवक का परम कर्तव्य होता है। वहां आदेश की जरूरत नहीं होती कि आदेश नहीं हुआ। स्वामी संकट में फंसे हैं। मंत्रियों को बुलाया दमयंती जी ने और कहा प्रधान प्रधान क्या-क्या हारा गया मुझे बताओ। मंत्री ने सब कुछ बता दिया। अमुक अमुक धनराज खजाना महल राज परिवार की सुविधाएं सब कुछ हार चुके हैं। शोक से व्याकुल हुई दमयंती महाराज के पास जाकर प्रसन्न मुद्रा में कह रही देखो ये धर्म कहता है यदि सामने वो निराश और हताश हो रहे हैं तो अपने को ऐसा सामने पेश नहीं करना कि और दुखी हो जाए।

प्रसन्न मुद्रा में कहा कि महाराज आपको पता है आप क्या-क्या हार चुके हैं और आप किस गति को पहुंच रहे हैं। प्रार्थना है आप सावधान हो जाइए। जो हुआ छोड़ दो। जितना बचा उतने में हम रह लेंगे। धर्म पूर्वक जीवन व्यतीत करो। ये अधर्माचरण आपको परास्त कर रहा है। जुआ खेलने से महाराज का सारा का सारा ज्ञान चौपट हो गया था। दमयंती जी लाख समझाए महाराज ने आंख उठा के भी नहीं देखा। सब कुछ हारते चले गए। अब लगाने के लिए कुछ नहीं बचा। कुछ नहीं। चक्रवर्ती सम्राट के पास कुछ नहीं बचा।

तब पुष्कर ने हंस के कहा कि तुम्हारे पास दमयंती रह गई है जैसे दुर्योधन आदि ने प्रेरणा की। और तो मैंने जीत लिया सब कुछ। तुम्हारी अगर इच्छा हो तो एक दांव पर फाइनल हो जाएगा। अब दमयंती को रख दो या तो तुम्हारी राज्य सहित और या फिर मेरी महाराज के आंखों में आंसू आ गए नहीं इतना नहीं कर सकते राज्य हार गया सब कुछ हार गया इतना नहीं कर सकते ऐसी धर्म से चलने वाली पत्नी को तुम जैसे कुमार्ग गामियों के हाथ में नहीं थोड़ा काम किया बुद्धि महाराज ने कहा कि मेरा हृदय विदर्ण हो गया तुम्हारी ये बात सुनकर के मेरे में इतनी सामर्थ्य नहीं कि मैं ऐसा कर सकूं।

मेरे आभूषण बचे हैं। क्या यह दांव में लग सकते हैं? सब कुछ तो चला गया। और आभूषणों को दांव में लेकर के आप एक बार देख लीजिए। आभूषण लगा वो पासा तो कलयुग के प्रभाव को खत्म। महाराज ने कहा मेरे वस्त्र वस्त्र भी ले लिए। बड़ा विचित्र भगवान का खेल इतना ज्ञानी इतना संयमी राजा और कलयुग प्रवेश कर गया तो कहां कुछ नहीं दिगंबर कपड़े उतरवा लिए और आदेश किया इसी वक्त हमारे राज्य की सीमा के बाहर निकल जाइए पुष्कर ने दमयंती जी के शरीर पर कोई आभूषण नहीं होगा। एक वस्त्र का आदेश करते हैं और तुम ऐसे निकलो राज्य से बाहर।

पूरी प्रजा में हाहाकार महाराज नल तीन रात तीन दिन चलने के बाद उस नगर की सीमा के बाहर जंगल में पहुंचे। पुष्कर ने घोषणा करवा दी महा महाराज नल को जो कोई भी पानी भोजन वस्त्र देगा उसे मृत्युदंड दिया जाएगा राज्य में कोई भी पानी भोजन वस्त्र भी नहीं देगा सम्मान की तो बात जाने दो कोई भी प्रजा की ताकत नहीं थी कि उनके अब अधिकार उसके हाथ में है। पुष्कर के वचन के अनुसार कोई भी पूर्वासी थोड़ा भी सहयोग नहीं किया। किसी सरोवर में जल लेकर के तीन रात्रि तीन दिन बराबर चलकर के वो जंगल में वहां पहुंचे।

भूख से पीड़ित हैं। राजा रहे हैं। कुछ कंद मूल फल जुटाए। दमयंती जी उनके पीछे पीछे चल रहे हैं। दमयंती जी ने समझ लिया था कि जो बुद्धि शास्त्र विरुद्ध चलती है वो सर्वनाश करा देती है। तो अपने कुमार और कुमारी को महाराज के सारथी से कहा कि तुम हमारे मायके में ले जाकर के इनको दे दो और यह महाराज का दिव्य अश्व है। इसकी सुरक्षा की जाए। कभी समय आएगा तो हो सकता है महाराज की सेवा में और तुम गुप्त रूप से रहना। तुम महाराज के सारथी हो। महाराज के समान बुद्धिमान हो। तुम अपने को प्रकाशित मत होने देना कि महाराज नल के सारथी हैं और हमारी पुत्री और पुत्र को हमारे मायके में कुंडनपुर भगवान का बड़ा विचित्र खेल है।

यदि भगवत आश्रय ना हो तो कितना दुख ही दुख है। अब दमयंती जी साथ चल रहे छुधा से पीड़ित महाराज कंद मूल फल एकत्रित करते हैं। पर कंदमूल ऋषियों का आहार है जिन्होंने स्वाद को नष्ट कर दिया है। अब यह राजा थे सामने इनको दिखाई दिया कुछ पक्षी हैं जिनके स्वर्ण के पंख हैं। उनके मन में आया कि यदि यह पक्षी फंस जाए और स्वर्ण के पंख हम निकाल कर बेच दें तो अन्न आदि मिल जाएगा तो भोजन तो हो जाएगा। मेरे भोजन की व्यवस्था इससे हो जाएगी। अब वहां जाल तो है नहीं। महारानी साड़ी है बड़ा वस्त्र होता है।

काट के उसको से उन पक्षियों को बैठे हुए थे। फेंका वो पक्षी नहीं थे। वह पासे थे जो पक्षी रूप में आकर आकर्षित कर रहे थे वह आधा वस्त्र उड़ा के ले गए और कहने लगे खोटी बुद्धि वाले नरेश जो धर्म का त्याग कर देता है उसको मैं पग पग पर दंड देता हूं। मैं कोई पक्षी नहीं हूं। मैं पुष्कर के हाथ का पासा हूं जो पक्षी बनकर आपको धोखा देने आया था। यह महाराज युधिष्ठिर को प्रसंग सुनाया जा रहा। भगवान व्यासदेव जी ने रचना की। अब मुझे चैन मिल रहा है। आप इतने कष्ट में हो। अब अच्छा लग रहा है।

महाराज नल ने दमयंती से कहा तुम सती हो, साध्वी हो। देखो मेरा अब ना तो क्रोध काम करेगा ना बल काम करेगा। क्योंकि मैं बलहीन हो चुका हूं। सुधा पीड़ित हूं। पता नहीं मेरा जीवन अब किस तरफ जाएगा। मुझे कुछ पता नहीं है। मेरी प्रजा भी भयभीत है और मुझे कोई आदर नहीं देगी। देखो मैं इतना निर्बल हो गया कि वो वस्त्र भी पक्षी ले जा रहे। मैं उनको रोक नहीं पा रहा। आज हमारे जीवन में ऐसी परिस्थिति आ गई है। मेरी चेतना लुप्त हो रही है। मैं तुम्हारा पति हूं और तुम्हारा मित्र भी हूं।

इसलिए एक तुम्हें बहुत हित की बात बता रहा हूं। यह जो मार्ग जा रहा है, यह दक्षिण की दिशा की तरफ है। इसके आगे एक रिकवान पर्वत है। उसे लांग करके जाना। वहां एक अवंती राज्य है। वहीं एक बं पर्वत दिखाई दे रहा है। वहां पयोषनी नदी है। बड़े-बड़े महर्षियों के आश्रम है। वहां महर्षि गण सुंदर सुंदर फैला आदि की पहचान भी जानते हैं। तो वहां जाकर कुछ दिन रुकना। उनकी सुरक्षा में और फिर वहां से विदर्भ देश का राज्य का मार्ग वो तुम्हें बता देंगे। तुम उस मार्ग से जाकर के अपने मायके में चले।

एकाग्रचित होकर मैं तुमसे तुम्हारे हित की बात कहता हूं। अब मेरे जीवन का तो क्या भरोसा? कहां जाएगा? क्या होगा? कैसी परिस्थिति होगी? दमयंती जी विकल होकर के बोली कि मैंने सुख का वर्णन नहीं किया। मैंने किसी राजा का वर्ण नहीं किया। मैंने आपको वरण किया है और आपको वरण किया है तो आप जिस परिस्थिति में हो मैं आपके साथ हूं। उनका हृदय बहुत व्यथित हुआ। कहा महाराज राज्य छीन जाने पर, धन नष्ट हो जाने पर, अपमान होने पर भी मुझे उतना दुख नहीं हुआ जितना आपके वचन सुनकर दुख हुआ।

आप मुझे अलग करने की बात करते हैं। मुझे असहाय बनाना चाहते हैं। अभी मैं असहाय नहीं हूं। आपके साथ हूं तो महाराज चाहे जैसी परिस्थिति में आप हो जब आप थके होंगे निराश होंगे तो हम आपके चरण दबाकर आपको वाणी के द्वारा सांत्वना देंगे। आपका उत्साह वर्धन करेंगे। आप मुझे छोड़िएगा नहीं। सबसे बड़ी चिकित्सा वचन चिकित्सा होती है। दवाइयां तो होती है लेकिन किसी को अगर उत्साह बढ़ा दिया जाए तो सबसे बड़ी दवा होती है। कोई कितना भी बड़ा रोग हो अगर उसका मानसिक उत्साह बढ़ा दिया जाए तो रोग को ऐसे साधारण समझकर सह लेगा और मानसिक स्तर गिरा दिया जाए तो स्वस्थ पुरुष भी रोगी हो जाएगा।

स्वस्थ पुरुष भी दमयंती जी ने कहा मेरा वचन और मेरा सहयोग आपको सदैव प्रसन्न रखेगा। इसलिए आप मुझे त्यागिए मत। नल ने कहा तुम जैसा कहती हो अक्षरशा ठीक है। पत्नी के समान कोई मित्र नहीं होता। क्योंकि अपने जीवन को समर्पित किए हुए है। पर मेरा कर्तव्य मुझे तुम्हें साथ रखने के लिए आदेश नहीं करता। क्योंकि मुझे पता है मुझे भयंकर अब कष्ट पाना है और मैं तुम्हें कष्ट से युक्त देख नहीं सकता। हे प्रिय मैं शरीर का त्याग कर सकता हूं पर तुम्हें कष्ट में नहीं देख सकता।

यह पति का धर्म है। समझे? मैं शरीर का त्याग कर सकता हूं। पर तुम्हें कष्ट से यह पति का धर्म है। पत्नी का धर्म क्या है? कि मेरा जीवन मेरा वचन आपको हर समय प्रसन्न रखेगा। कैसी भी परिस्थितियों में हो मैंने आपका वर्णन किया है राज्य का नहीं आपके सद्गुणों का नहीं आपकी महिमा का नहीं ये तभी ऐसे सद गृहस्थ महात्मा कहे जाते हैं ऐसे सद गृहस्थ महात्मा कहे जाते हैं महाराज मुझे पक्का पता है आप त्याग देंगे क्योंकि आपने जो विदर्भ देश के मार्ग का वर्णन किया इससे मुझे पक्का पता है कि आप मुझे त्याग देंगे पर महिपते बड़ी से बड़ी आपत्ति में भी अपने शरणागत का त्याग नहीं किया जाता और मैं आपकी शरण में हूं।

आपको त्याग नहीं करना चाहिए। यदि आपका अभिप्राय है कि मैं बंधु बांधुओं के यहां सुखी रहूंगी तो कदापि नहीं। मैं आपके चरणों के समीप सुखी रहूंगी। महाराज नल ने कहा कि इस समय तुम्हारी यह बातें मुझे सुहाती नहीं क्योंकि मुझे केवल एक बात दिखाई दे रही है। मेरे सामने बड़ा दुख खड़ा है और मैं उस दुख को अकेले भोगना चाहता हूं क्योंकि मेरे ही कर्म का ही फल। मैंने जुआ खेला तुमने तो नहीं खेला ना। इसलिए हम तुम्हें दुखी नहीं करना चाहते। तुम पतिव्रता हो। तुम्हें कभी कोई किसी भी तरह से हानि नहीं पहुंचा सकता है।

मुझे विश्वास है। राजा नल ने अनेक प्रकार से उनको बोध कराया कि तुम सती हो। पातिवत धर्म से युक्त हो। घबराना नहीं। दमयंती ने कहा इसका मतलब मेरी भक्ति में अभी कमी है। अगर भक्ति में कमी ना होती तो आप मुझे क्यों त्याग देते? महाराज ने कहा यह तो हम आपको बता रहे थे। कोई त्याग थोड़ी रहे हैं। चलो दमयंती को साथ लेकर के जंगल में ढूंढते रहे कि कोई स्थान मिले जिसमें रात्रि में शयन हो। तो एक खंडहर जैसा था। वहां देखा। कहा आज रात्रि यही शयन करते हैं। पर फिर हम तुम्हें संबोधन करते हैं कि यह मार्ग अमुक अमुक जगह से ऐसे जाता है।

वैसे तो समझ ही गई थी कि महाराज का क्या संकल्प है। पर थकी इतनी थी कि उनको नींद आ गई तो उनका थोड़ा वस्त्र काट के ऐसे ही अपने शरीर को ढका और एक बार लौट के देखा और बस चल पड़े छोड़ के व से राजा नल यद्यपि बहुत हृदय से दुखी। सब कुछ छीन जाने पर भी ऐसी प्रिय धर्मात्मा पत्नी का इस तरह से त्याग करना बिल्कुल ठीक नहीं है। पर उनको यही लग रहा है पता नहीं कौन सा संकट मुझे भोगना पड़े। अगर ये चली जाएंगी तो सुरक्षित रहेंग। अचानक रात्रि में आंख खुली तो देखा महाराज ने विलाप करने लगी।

क्या कोई अपने इस तरह समर्पित पत्नी का त्याग करता है महाराज आप जैसे नाथ होने पर भी मुझे अनाथ करके क्यों छोड़कर चले गए और मेरा आधा वस्त्र शरीर से लपटा हुआ है। इसका मतलब आधा वस्त्र आप अपने शरीर के लिए जिससे तन ढक जाए। यह हिंसक पशुओं से भरा हुआ वन है। और मुझे अकेला छोड़कर आप जाने की सोच कैसे लिए? ऐसे वो विलाप कर रहे हैं। राजा नल की बुद्धि में कलयुग सवार है। अशांति पैदा की हुई है। कलयुग के स्पर्श से महाराज की बुद्धि धर्म निर्णय करने में शिथिल हो गई। निर्णय ठीक नहीं हो पा रहा क्योंकि बुद्धि कलयुग से ग्रसित हो गई।

वह अपनी ऐसी पतिव्रता पत्नी को अकेले ही निर्जन में छोड़कर के चल दिए। निर्जन वन में अपने स्वामी को ना देखकर के दमयंती बहुत भयभीत हो गई। विलाप करने लगी। जो धर्मज्ञ हैं, सत्यवादी हैं, भलाओ मुझको कैसे छोड़ सकते हैं? बार-बार प्रश्न आता है। ऐसा कैसे कर सकते हैं? क्योंकि मेरा कोई दोष तो होना चाहिए। मृत्यु असमय में नहीं आती। ऐसे ही तुम्हें मुझे त्यागना नहीं चाहिए। अगर परिहास कर रहे हो तो महाराज प्रकट हो जाइए। कहां हो? अगर विनोद कर रहे हो तो प्रकट हो जाइए।

मैं बहुत डर गई हूं। आप मुझे दर्शन दीजिए। भूख, प्यास, परिश्रम, दुख यह मुझे परास्त नहीं कर सकते। पर आपका संग त्यागना अब मैं परास्त हो जाऊंगी। अब मेरे दुख की सीमा नहीं रहेगी। यह सब दुख में सह सकती थी। प्रचंड शोक से दमयंती दुखी होकर चिल्ला चिल्ला कर रोने लगी और वन में खोजने लगी। दमयंती दीर्घ स्वासे लेते हुए हां महाराज हां महाराज ऐसा कह रही थी विलाप करती हुई उस जन्म जंगल में घूम ही रही थी कि एक विशाल भारी भरकंप अजगर जो भूख से व्याकुल था दमयंती जी को देखा और उसने लंबी श्वास खींची जो जंगल में बड़े-बड़े अजगर होते हैं वो दौड़ के नहीं खाते मुंह फैला दिया और श्वास खींची।

जैसे प्रबल तूफान से कोई भागता चला जाए। ऐसे उनकी वायु के आकर्षण से वो उनके मुख तक आ जाता है। विशाल अजगर होते हैं। चक्कर काटती हुई दमयंती उसके मुख के समीप आ गई। उसकी ऐसी खींच हुई कि बेशुद्ध होकर चक्कर काटती हुई उसके मुख के समीप आ गई। और वो निगलने की चेष्टा करने लगा। विलाप करती हुई कहने लगी कि यही उचित है। आपसे वियोग होने पर इस शरीर का नष्ट हो जाना ही ठीक है। क्योंकि आज मैं अनाथ हो गई आपके बिना। वो ऐसे विलाप कर ही नहीं रही थी। अजगर आधा लेल चुका था। ऐसे वह धीरे-धीरे अपने शिकार को लेलता है।

वहां एक व्याध टहल रहा था जो जंगल में ही रहता था। पशुओं को मार कर खाता था। ऐसे हिंसक उसने करुण क्रंदन सुना तो भाग के आया तो देखा इतना शरीर अजगर लील गया था। बड़े वेग से आया और अजगर के द्वारा निगली जाती हुई दमयंती को बचा। उनके पास अस्त्र भी होते हैं। तुरंत उस अजगर को काट के मार के दमयंती को निकाला। दमयंती से कहा आप चिंता मत करो। अब आप स्वस्थ हैं। वो मारा जा चुका है अजगर। तुम किस प्रकार से इतने सुंदरी होते हुए इस जंगल में कैसे दमयंती ने संक्षेप में अपना वृतांत सुनाया।

विद विदर्भ कुमारी दमयंती के आधे वस्त्र से शरीर ढका था। आधा महाराज ले गए थे। और इतने सुंदर देवता जिनके वरण करने के लिए तो फिर व्याध व्याध कामातुर होकर के उनसे बात करने लगा दमयंती जी से दमयंती जी जैसे बालक को समझाती है ऐसे कहा कि देखो मैं आपकी भावना को देख रही हूं तनिक भी दूषित भावना मत करना हमारे प्रति बड़ा तुम्हारा उपकार हुआ जो तुमने ने इस शरीर को बचाया पर इस शरीर पर काम भाव मत कर लेना। जानते हो मैं पतिव्रता हूं। पहली बार जो तुमने हमारा स्पर्श किया वो बचाने के लिए किया था।

इसलिए तुम्हारा मंगल नहीं हुआ। नहीं मेरे छूने मात्र से तुम्हारा मंगल हो जाएगा। अब वो व्याध बेचारा क्या जाने पतिव्रता क्या जाने। भागवत की बातें दमयंती ने कहा बस एक कदम भी आगे नहीं वाणी के द्वारा रोकने पर भी वो व्याध अत्यंत आविष्ट हो गया कोवा मदंधो मदना तो रोवा अंधों में अंधा कौन है अर्थात सबसे बड़ा मददा कौन है बोले जिसे काम चढ़ गया है काम वेग आ गया वो ये नहीं देखता है क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए कोई देखता है कि नहीं देखता पाप है कि पुण्य कुछ को मददो मदना तो रोवा जे आगे कदम बढ़ाया उन्होंने फिर कहा शांत हो जा और वापस हो जा स्पर्श मत कर लेना पर वो समझने की बुद्धि खो चुका था स्मृति नष्ट हो जाती बुद्धि भ्रष्ट हो जाती जहां काम का आवेश होता है आगे बढ़कर जो ही दमयंती का स्पर्श करने को किया।

दमयंती जी मन में संकल्प किया अपने पति के सिवा आज तक हमने कभी किसी को अगर काम भाव से चिंतन भी नहीं किया है तो वही प्रताप हमारी रक्षा करे। यही ऐसा कि उसके शरीर में जैसे पेट्रोल डाल के आग लगा दी गई हो ऐसे आग लग गई। देखतेदे जलकर भस्म हो गया। कोई श्राप नहीं दिया। कोई चेष्टा नहीं की। यह है पतिव्रता की सामर्थ्य। अगर मन वचन कर्म से मैंने कभी किसी के प्रति गंदी भावना नहीं की तो मेरी वही भावना मेरी रक्षा करे। तत्काल उस व्याध के शरीर में आग लग गई और देखतेदे भस्म हो गया।

अब उस निर्जन एवं भयंकर वन में असहाय दमयंती जी जहां सिंह चीता रु मृग व्याघ भयानक स्वभाव वाले भैंसे रीच बड़े-बड़े सब जंगली पशु उनकी आवाज जो भय प्रदान करने वाली वृक्षावलियों की पंक्तियां सेमल जामुन आम खैर शाकू बेत पद्म का आंवला पाकर कदंब गूलर ये बड़े-बड़े वृक्षों की जहां ऐसे भयानक पशु ऐसे वृक्ष अब अपने को छुप छुप करके उन पशुओं से बचाते हुए विदर्भ राजकुमारी अकेली ढूंढ रही हैं। कहा है महाराज नल पति का विरह संकट हृदय में जला रहा है। एक गुफा थी उसमें बैठकर के विचार करने लगे कि शायद मेरे ही किसी कर्म का फल ऐसा उदय हुआ है कि जो मुझे भोगना पड़ रहा है अपने पति से विलग होकर पर जिस मार्ग को मेरे पति ने आदेश किया है मेरा कर्तव्य बनता है उसी मार्ग में चलना।

देखो कैसी भी परिस्थिति हो धर्मात्मा पुरुष कभी भी अपने पूज्य जनों की आज्ञा उल्लंघन नहीं करते। मन में विचार किया कि अगर उन्होंने छोड़ा तो उसके पहले मुझे मार्ग भी बताया कि इस मार्ग से जाना है। उस मार्ग में वो भयभीत होते हुए चल रहे। कितना कष्ट आता है जीवन में। देखो अपने छोटे-छोटे कष्टों में उब जाते हैं। चक्रवर्ती सम्राट की ऐसी सुखद महल में रहने वाली महारानी ऐसी परिस्थिति कि तन ढकने के लिए पूरा वस्त्र नहीं, कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं, कोई पास नहीं, ऐसा भयंकर जंगल जो प्रीतम पति हैं उन्होंने भी उनको छोड़ दिया है।

विदर्भ राजकुमारी दमयंती अकेली पति की खोज में भटक रहे हैं। शोक से पीड़ित है और वन से प्रार्थना कर रहे कि मुझे साहस दीजिए। आप सब चैतन्य घन है। जरूर वृक्ष रूप में हैं लेकिन मुझे साहस दीजिए कि मैं अपने पति के बताए हुए मार्ग पर चलूं। विविध धातुओं शिला खंडों को पार करती हुई आगे बढ़ने लगी। जब कोई धर्मात्मा पुरुष संकट में होता है तो भगवान अपने आप कोई ना कोई व्यवस्था कर देते हैं। लगातार कुछ रात्रि और दिन बराबर चलती रही। वहां देखा कि बड़े तपस्वी जन विराजमान हैं।

साधु महात्मा जो एकांत तपस्या करते हैं। वो उनमें से कुछ केवल जल पीकर रहते हैं और केवल कोई वायु पीकर के रहते हैं। कुछ ऐसे हैं जो सूखे पत्ते खाकर रहते हैं। वो व्कल की लंगोटी वृक्षों की छाल की लंगोटी लगाए। ऐसे तपस्वी महात्माओं से भरे उस आश्रम को देखा तो दंती के हृदय में शीतलता हुई। साधु ते होए ना कारज हानि। तपोवृद्ध महात्माओं के समीप जाकर उनको सिर रखकर के प्रणाम किया और विनीत भाव से खड़ी हो गई। तपस्वी महात्माओं ने कहा देवी तुम्हारा स्वागत है। आप निर्भय होकर के विश्राम कीजिए।

आप हमें बताइए कि हम आपका कौन सा कार्य सिद्ध कर सकते हैं जिससे आप सुखी हो सकते हो। दमयंती ने उनसे कहा भगवन आप सब कुशल से हैं। आपकी साधना कुशल से तपस्या कुशल से है। महात्माओं ने कहा भगवान की कृपा से सर्वत्र यहां कुशल मंगल कोई बाधा नहीं। महात्माओं ने कहा तुम्हारे रूप सौंदर्य को देखकर के ऐसा लगता है कि तुम्हें शोकित नहीं होना चाहिए। तुम देवी हो धैर्य धारण करो। उन्होंने पूछा कि आप यहां जंगल में अकेली कैसे? तब विस्तार पूर्वक अपनी बात बताई कि विदर्भ देश में भीम नाम से प्रसिद्ध एक भूमिपाल हैं।

उन्हीं की मैं राजपुत्री हूं। निषद देश के राजा संग्राम विजय महाराज नल मेरे पति हैं। जो सदैव धर्म का पालन करते हैं। ब्रह्म ऋषियों का आदर करते हैं। पर आज वह जुआ खेलकर अपना सर्वस्व हार गए हैं। और वह बहुत दुखी होकर हमें त्याग करके वन में भटक रहे हैं। तो मैं उनकी खोज करते हुए उनके बताए हुए मार्ग से चल रही हूं। क्या आप बता सकते हैं कि मेरे महाराज नल कहां है? कैसे हैं? क्या आपने देखा है? या किसी पशु आदि के द्वारा आक्रमण करने पर वह घायल हो चुके हैं, दुखी हैं।

अगर आप कृपा करके मुझे महाराज नल के दर्शन करवा दें तो मेरी हृदय को जो प्रसन्नता होगी वह किसी और आशीर्वाद से नहीं होगी। मैं उन महापुरुष के बिना अपना जीवन धारण करना व्यर्थ समझती हूं। ऋषियों ने कहा कल्याणी मैं तपोबल से सब कुछ देख रहा हूं। महाराज को ना किसी पशु ने छुआ है और ना कोई उनके अंगों को कोई कष्ट पहुंचा सकता है क्योंकि धर्मात्मा पुरुष हैं। अभी तो दर्शन तुम्हें नहीं हो सकता। पर तुम इंतजार करो। तुम्हारे पति तुम्हें प्राप्त होंगे। सारे दुख मिटेंगे।

संपूर्ण राज्य मिलेगा। बीच में अभी कुछ समय है। उसको तुम सहो क्योंकि जो धर्म का आदर करता है उसका कभी नाश नहीं होता। धर्मो रक्षति रक्षता राजकुमारी दमयंती हम लोग अग्निहोत्र और आश्रम में रहकर तपस्या करते हैं। यह हमारी कृपा से तुम हमें देख पा रहे हो। अभी तुम्हारे देखते देखते सब अंतर्ध्य हो जाएगा। ना आश्रम रहेगा ना ऋषि रहेंगे। यह हमने प्रकट किया है केवल तुम कि दर्शन करके संतुष्ट हो चुको। यह हम प्रगट में नहीं है। हम सब अव्यक्त महात्मा हैं। यह आश्रम नहीं है।

यह केवल हमारे संकल्प से प्रकट हुआ है। उसी समय दमयंती ने आश्चर्य की बात देखी कि ना वहां कोई कुटिया ना वहां कोई महात्मा है। जंगल ही जंगल। आप समझो अपने लोग जो भगवत मार्ग में थोड़ा भी ठीक से चल पा रहे हैं। अहंकार मत करना कि अपने से चल रहे हो। जो अपनी परंपरा के गुरुजन हैं, महापुरुष जन है वो हमें अपनी करुणा दृष्टि से देख रहे हैं कि मेरे शरणागत जन है। ये मेरे ही आश्रित हैं। उन्हीं के दुलार से हम चल पा रहे नहीं। हमारी सामर्थ्य नहीं है। अब वो जो नदी थी उसके किनारे किनारे वो चलने लगी।

विशाल एक पर्वत आया। समीप अशोक के वृक्षों को देखकर कहा हे अशोक विशोकाम कुरमा प्रशोक प्रियदर्शनम हे अशोक तुम्हारा नाम अशोक है मेरे शोकों को दूर कर दीजिए आधी साड़ी के टुकड़े से अपने शरीर को ढके हुए वो आगे बढ़ रही है चक्रवाद आज पक्षी मृगा आदि उनको देखने के लिए दौड़ कर आकर के घेर घेर लेते हैं। समूह के समूह शोभायमान पक्षी इसलिए उनको घेर लेते कि भयाव जंतुओं का भय ना रह जाए और वो मार्ग में चल रही है। आगे बढ़ी तो एक यात्रियों का दल दिखाई दिया। घोर जंगल में पहले यात्रीग नाव से या घोड़े आदि से व्यापार करते थे।

तो एक यात्रियों का समूह जो व्यापारियों का दल था। बहुत से लोग उनके साथ हाथी घोड़े भी उनमें सब सामग्री लदी हुई थी। उस विशाल समुदाय को देखकर के धमती जी को साहस हुआ कि चलो अच्छा कोई तो मिला जिसके साथ हम चलेंगे। पीछे पीछे उनके चलने लगे। यात्री आगे और वह पीछे पीछे अकेली चल रही। व्यापारियों ने एक महान सरोवर पद्म सौगंधिक नाम का वहां ईंधन भी था, फल फूल भी थे। सरोवर जल पीने के लिए भी था। वहां अपने दल को रोक दिया। वहां पड़ाव डाला गया। जितने भी उनके दल के लोग थे 26 अब दमयंती जी मन में विचार किया कि इनके समुदाय के साथ तो हमें रहना पर दूर क्योंकि इन्हीं के साथ कहीं ना कहीं किसी नगर में जाते होंगे तो जंगल से तो निकले अब वो एकांत में बैठी रात में अपने प्रीतम का चिंतन कर रहे हैं।

इधर मतवाले जंगली हाथियों का एक समुदाय आया। और जितने सब पड़ाव पड़े थे वो सब यात्रियों के दल को हाथियों ने रौंद दिया। किसी को फाड़ दिया ऐसे जंगली आदमी जितने भी उनके साथ घोड़े सुरक्षा दल अब वो जगे होते तो अब तो विश्राम की स्थिति में थे और जंगली हाथ आकर वेग पूर्वक आक्रमण कर दिया बहुत लोग मर गए उसमें से बहुत से उनके घोड़े नष्ट हो गए व्यापार की सामग्रियां उस दल को कुचल दिया। कोई धरती पर कड़ा करा रहा है। कोई जोर से चिल्ला रहा है। कोई घायल हो चुका है। कोई मर चुका है।

उनके साथ जो ऊंट थे, घोड़े थे वह भी मारे गए। आर्तनाद हो गया। बड़ी भयंकर वहां आवाजें आ रही हैं। और रत्न बिखरा हुआ पड़ा है। क्योंकि व्यापारी के दल थे। उनमें से कुछ लोग जो बचे तो उनका सरदार अपनी आंखों से सब देखकर के उसने कहा ऐसा कौन अमंगलकारी है? आज तक तो हमारे दल में ऐसा नहीं हुआ। हम देवताओं का पूजन करते हैं अपनी सुरक्षा के लिए। पर कोई तो ऐसा है अमंगलकारी जिस जो हमारे साथ हो गया और हमारा पहली बार ऐसी घटना घटी है। कोई ऐसा अमंगल है जांच की जाए तो दमयंती जी आधा वस्त्र से शरीर ढके हुए और वो मन में सोचा कि अगर यह मुझे पा गए कि तो यही मानेंगे कि मेरे द्वारा ही मंगल होता है।

शोक से युक्त हो गए कि मैंने कौन सा पाप किया है। किस निर्जन वन में मुझे यह सहायता मिली थी कि इनके पीछे पीछे चलती इनके संग हुई तो मेरे कारण पूरा झुंड मारा गया। मुझे लगता है कि मेरा भाग्य ही अमंगल युक्त है। क्या मेरी मन वाणी क्रियाओं द्वारा ऐसे पाप हुए हैं कि मैं जिनके साथ हो जाती हूं उनका नाश हो जाता है? क्या अपराध बन गया? अब वह उनके झुंड से चुपचाप अलग हुई कि अगर यह लोग पा गए तो मुझे अमंगल समझ कर मारेंगे। आगे बढ़ी तो देखा कि कुछ वैदिक ब्राह्मण किसी नगर में किसी उपरोहित कार्य के लिए जा रहे हैं।

ग्रंथ लिए हुए। यह देखकर के उनके हृदय में जैसे चंद्रमा शीतल प्रकट हो तो ताप से मुक्त करता है। ऐसे उनके हृदय में शीतलता हुई और ब्राह्मणों के पीछे पीछे गुप्त रूप से चली। सत्यदर्शी चेदराज सुबाहु की राजधानी में पहुंची। जंगल से पार होकर। आधी साड़ी शरीर में लपेटे हुए हैं। सिर के बाल खुले हुए हैं। क्योंकि बहुत दिनों से स्नान ही नहीं किया है। ऐसा देखने से लगता है जैसे उन्मत या कोई पागल हो। ग्रामीण बालक उन्हें पागल समझकर उनके पीछे दौड़ रहे हैं। खिलवाड़ कर रहे हैं।

जैसे सुखदेव मुनि के पीछे कोई कंकड़ मार रहा है। कोई दिगंबर देखकर आधा वस्त्र शरीर में दमयंती और स्नान नहीं किया। जंगल में इतना कष्ट पाती तो ऐसा लग रहा है कोई पागल है। दमयंती जी जब राजमहल के समीप गई तो जनसाधारण लोग घेरे हुए थे दमयंती जी को। राजमाता ऊपर से देख रही थी। देखते ही कि यह तो कोई महान भाग्यशाली है। इसके शरीर के चिन्ह ऐसे बता रहे हैं कि यह कोई महारानी कोई साधारण नहीं है। पर ऐसी दशा को कैसे प्राप्त हो गई? धाय को आदेश किया तुरंत जाओ इन सब लोगों से हटा के उस युवती को हमारे समीप लाओ।

ये जो तंग कर रहे हैं लोग इनको दूर हटाओ। इसका वेश उन्मत्त जैसा है। परंतु यह विशाल नेत्रों वाली लक्ष्मी के समान सौभाग्यशाली दिखाई दे रही है। धाए गई लोगों को हटाया और उनसे निवेदन किया कि आप राजमल पर चले। महारानी जी ने आपको बुलाया है। राजमहल की अटालिका पर उनको ले गई। राजमाता ने जे ही देखा कहा आश्चर्य है तुम्हारे तो लक्षण ऐसे हैं कि तुम्हें चक्रवर्ती सम्राट की महारानी होना चाहिए। तुम ऐसे विक्षिप्त पागलों जैसी गलियों में घूम रही हो। तुम्हारे शरीर की बड़ी कांत प्रकट हो रही।

इससे पता चलता है तुम पतिव्रता हो। तुम्हारे शरीर पर आभूषण नहीं पर फिर भी तुम इतनी विभूषित सौंदर्य से युक्त हो। यह दिव्य कांत यह दिव्य रूप इस असहाय अवस्था में भी प्रकाशित हो रहा है। दमयंती जी ने कहा कि मैं कोई देवी नहीं हूं। मानव कन्या ही हूं। मैं अपने पति के चरणों में अनन्य अनुराग रखने वाली पतिव्रता नारी हूं। पर मेरा इस समय भाग्य बदल चुका है। मेरे पति मुझे छोड़ चुके हैं। पति का राज्य छीन चुका है। क्या मुझे सेविका के रूप में यहां जगह मिल सकती है? मैं आपकी सेवा करूं और यहां रह जाऊं।

अगर मुझे जीवन निर्वाह के लिए कुछ समय के लिए मुझे यहां रख लिया जाए तो सब कलाओं में मैं प्रवीण हूं। जो भी आप सेवा कहेंग वो मैं सेवा करूंगी। जैसे छाया शरीर को नहीं छोड़ती। ऐसे ही मेरी सेवावृत्ति मुझको नहीं छोड़ती। अर्थात मैं देख के समझ जाऊंगी तुम्हें क्या आवश्यकता है। तुम्हारी क्या सेवा होनी चाहिए। आपको कहना नहीं पड़ेगा। इतनी प्रवीण इस समय मैं भूख से पीड़ित हूं। मेरे शरीर पर वस्त्र भी ठीक से नहीं है। यदि आप ऐसा कर सके तो आपका बड़ा अनुग्रह होगा। बस एक बात तुम्हें ध्यान रखना है कि मैं अपने पति के सिवा किसी भी पुरुष का ना दर्शन करती हूं ना स्पर्श करती हूं।

ऐसे देखना अलग बात है। रानी से कहा कि मैं सेविका का कार्य करूंगी पर कभी आपकी जूठन नहीं पाऊंगी। और कभी किसी पुरुष की सेवा के लिए कभी आदेश ना दिया जाए। यदि इस तरह मुझे महल में रख लिया जाए। कुछ समय तक तो हमारा समय गिरा हुआ है। आगे जब समय आएगा जैसा प्रेरणा होगी फिर हम आगे करेंगे। चलो यही विश्राम करते हैं आगे श्री राधा वल्लभ लाल की

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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