॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित चौरासी जी — पद 30

देखत नवनिकुंज सुनि सजनी, लागत है अति चारु ।
माधविका केतकी लता लै, रच्यौ मदन आगारु ॥
सरद मास, राका निशि सीतल, मंद-सुगन्ध-समीर ।
परिमल लुब्ध मधुब्रत विथकित, नदत कोकिला-कीर ॥
बहुविधि रंग मृदुल किसलय दल, निर्मित पिय सखि सेज ।
भाजन कनक विविध मधुपूरित, धरे धरनि पर हेज ॥
तापर कुशल किशोर-किशोरी, करत हास-परिहास ।
प्रीतम पानि उरज वर परसत, प्रिया दुरावत वास ॥
कामिनि कुटिल भृकुटि अवलोकत, दिन प्रतिपद प्रतिकूल ।
आतुर अति अनुराग विवस हरि, धाइ धरत भुज-मूल ॥
नागर नीबी बन्धन मोचत, ऐंचत नील निचोल ।
वधू कपट हठ कोप कहत कल, नेति नेति मधुबोल ॥
परिरम्भन विपरित रति वितरत, सरस सुरत निजुकेलि ।
इन्द्रनील मनिमय तरु मानौं, लसत कनक की बेलि ॥
रतिरण मिथुन ललाट पटल पर, श्रमजल-सीकर संग ।
ललितादिक अंचल झकझोरत, मन अनुराग अभंग ॥
(जै श्री) हित हरिवंश यथामति बरनत, कृष्ण रसामृत सार ।
स्रवन सुनत प्रापक रति राधा, पद-अम्बुज सुकुमार ॥30॥