॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
श्री हित चौरासी जी — पद 35
झूलत दोऊ नवल किशोर ।
रजनी-जनित रंग सुख सूचत, अंग-अंग उठि भोर ॥
अति अनुराग भरे मिलि गावत, सुर मंदर कल घोर ।
बीच-बीच प्रीतम चित चोरत, प्रिया नैंन की कोर ॥
अबला अति सुकुमार डरत मन, वर हिंडोर झकोर ।
पुलकि-पुलकि प्रीतम उर लागत, दै नव उरज अँकोर ॥
अरुझी विमल माल कंकन सौं, कुंडल सौं कच डोर ।
वेपथ जुत क्यौं बनैं विवेचित, आनँद बढ्यौ न थोर ॥
निरखि निरखि फूलत ललितादिक, विवि मुख चन्द्र चकोर ।
दै असीस हरिवंश प्रसंसत, करि अंचल की छोर ॥35॥