श्री हित चौरासी जी — पद 38
बेगि चलहि उठि गहर करत कत, निकुंज बुलावत लाल ।
हा राधा-राधिका पुकारत, निरखि मदन गज ढाल ।।
करत सहाय शरद शशि मारुत, फूटि मिली उर माल ।
दुर्गम तकत समर अति कातर, करहि न पिय प्रतिपाल ॥
(जै श्री) हित हरिवंश चली अति आतुर, स्रवन सुनत तेहि काल।
लै राखे गिरि-कुच बिच सुन्दर, सुरत-सूर ब्रजबाल ॥38॥