श्री हित चौरासी जी — पद 39
खेल्यौ लाल चाहत रवन ।
रचि-रचि अपने हाथ सँवारयौ, निकुंज भवन ॥
रजनी शरद मंद सौरभ सौं, शीतल पवन ।
तो बिनु कुँवरि काम की वेदन, मेटव कवन ॥
चलहि न चपल बाल-मृगनैंनी, तजिव मवन ।
(जै श्री) हित हरिवंश मिलव प्यारे की, आरति-दवन ॥39॥
खेल्यौ लाल चाहत रवन ।
रचि-रचि अपने हाथ सँवारयौ, निकुंज भवन ॥
रजनी शरद मंद सौरभ सौं, शीतल पवन ।
तो बिनु कुँवरि काम की वेदन, मेटव कवन ॥
चलहि न चपल बाल-मृगनैंनी, तजिव मवन ।
(जै श्री) हित हरिवंश मिलव प्यारे की, आरति-दवन ॥39॥