श्री हित चौरासी जी — पद 55
आजु दोऊ दामिनि मिलि बहसी ।
बिच लै श्याम घटा अति नूतन, ताके रंग रसी ॥
एक चमकि चहुँ ओर सखी री, अपने सुभाय लसी ।
आई एक सरस गहनी में, दुहुँ भुज बीच बसी ॥
अम्बुज नील उभय विधु राजत, तिनकी चलन खसी ।
(जै श्री) हित हरिवंश लोभ भेंटन मन, पूरन शरद शशी ॥55॥