श्री हित चौरासी जी — पद 70
आजु सम्हारत नाहिंन गोरी ।
फूली फिरत मत्त करिनी ज्यौं, सुरत-समुद्र झकोरी ॥
आलस बलित अरुन धूसर मषि, प्रगट करत दृग चोरी।
पिय पर करुण अमी रस बरसत, अधर अरुणता थोरी ॥
बाँधत भृंग उरज अम्बुज पर, अलक निबन्ध किशोरी ।
संगम किरच-किरच कंचुकि बंद, शिथिल भई कटि डोरी ॥
देत असीस निरखि जुवतीजन, जिनकै प्रीति न थोरी ।
(जै श्री) हित हरिवंश विपिन भूतल पर, संतत अविचल जोरी ॥70॥