॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
श्री हित चौरासी जी — पद 7
आजु निकुंज मंजु में खेलत,
नवल किशोर नवीन किशोरी ।
अति अनुपम अनुराग परस्पर,
सुनि अभूत भूतल पर जोरी ॥
विद्रुम फटिक विविध निर्मित धर,
नव कर्पूर पराग न थोरी ।
कोमल किसलय सयन सुपेसल,
तापर श्याम निवेसित गोरी ॥
मिथुन हास-परिहास परायण,
पीक कपोल कमल पर झोरी ।
गौर श्याम भुज कलह मनोहर,
नीवी-बंधन मोचत डोरी ॥
हरि-उर-मुकुर विलोकि अपनपौ,
विभ्रम विकल मान-जुत भोरी ।
चिबुक सुचारु प्रलोइ प्रबोधत,
पिय-प्रतिबिंब जनाय निहोरी ॥
नेति – नेति बचनामृत सुनि-सुनि,
ललितादिक देखत दुरि चोरी ।
(जै श्री) हित हरिवंश करत कर धूनन,
प्रणयकोप मालावलि तोरी ॥7॥