॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 112

स्वप्न

ऐसी स्वप्न मोहि अति भावे।
न समीप मोहिनी मूरत, मंद - मंद मुसिकावै॥
कोटि चन्द छवि सुन्दर आनन, रूप सुधा बरसावै।
भोरी रंग भरी अलबेली, हिय में आइ समावै॥