॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
सखी विशाखा अति सुकुमारी।
छोटी वयस वड़ी-बड़ी अखियाँ, उमगत कृपा अंबुनिधि प्यारी॥
पोच पतित प्रतिपाल सुन्दरी, अति उदार रिझवार महारी।
कोमल तन कोमल मन नागरि, मृदुल स्वभाव रूप उजियारी॥
करुणा धाम कहा कहि वरणौं, आरत टेर सकत सहि नारी।
श्री बन वास रास रस छाकी, छिन न होत प्यारी सौं न्यारी॥
मेरी ओर कृपा करि हेरौ, निरवलंब अति देखि दुखारी।
कुंज वास है तेरौ सजनी हित जू कौं सुधि मेरी करा री॥
कहियत सहज कृपालु लाड़िली, अधम उधारन बान तिहारी।
पूछत क्यों न कुशल भोरी सौं, विलपत आरत द्वार पुकारी॥