सुन्दर स्वामिनि प्यारी हमारी, छबि निधि सहज रूप उजियारी।
मुख छबि कोटि चन्द सौं नीकी, हँसन दसन द्युति भाँवती जीकी।
चितवन बरसत वृष्टि अमी की, रंग भरी छबि सुखद सुखारी॥
लोचन रहत रूप ललचाने, सपनेहु तुम बिनु और न जाने।
शिशु लौं बार-बार हठ ठानै, चहुँ दिशि रहत निहार निहारी॥
हँसि कृपाल बिधु बदन दिखावौ, सहज माधुरी पान करावौ।
भोरी हिय की आस पुजावौ, तन मन रहौं चरण पर वारी॥