॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 128

नख-सिख

वह छटा छिन हू दिखावौगी कहौ,
माधुरी हँसि-हँसि पियावौगी कहौ।
मन कुटिल अलकन में मेरौ घेरि कै,
सब कुटिलता कब मिटाबोगी कहो॥
अपने कोमल पाँव धरि मेरे हिये,
सब कठिनता कब नसावौगी कहौ।
ओठ पै अनुपम लसैं अनुराग रस,
हँसि सुधा धारा झरावौगी कहौ॥
हौं तौ तेरे पंथ में व्याकुल पड़ी,
लाड़ सौं नूपुर बजावौगी कहौ।
है हियौ मम तप्त तीनहुँ ताप सौं,
अपने पद सौं कब सिरावौगी कहौ॥
हॉजु सोती दे दरस कब स्वप्न में,
भाग्य सोये कौं जगावौगी कहौ।
अपने कच के संग मो मन बाँधिहौ,
अपनी छवि में दृग फँसावौगी कहौ॥
नयन कोयन सौं बरसि कै माधुरी,
मेरौ मन रँग में डुबावौगी कहौ।
मेरी भोरी कहिकै हँसि-हँसि लाड़िली,
सब सौं कब नातौ छुड़ावौगी कहौ॥
हों तों व्याकुल टेर नित द्वारे करत,
अब तौ मेरे हिय समावौगी कहौ।