अलक कुटिल मन मेरौ फँसावौ, नयन कोर हिय माहि धँसावौ।
हौं तौ विलपत बिकल अकेली, आइ हँसौ छिन मोहू हँसावौ॥
जाकौं ठीक-ठौर नहिं कितहूँ, तेहि भुज गहि बरसाने बसावौ।
चरण धूर लगि धूर मिली में, अब न कृपालु बहुत तरसावौ॥
लोचन मृदु मुसकान लुभाने, छिन इक छटा विहँसि दरसावौ।
भोरी चातक दीन पुकारत, हँसि-हँसि क्यों न सुधा बरसावौ॥