प्यारी मोहि ऐसो जीवन भाव।
आलस भरी लता के गृह में, रचि शैया पौढ़ावै॥
तुम सोवौ मैं ब्यार डुलावौं, भाग्य कह्यौ नहिं जावै।
तुम हूं अकेली मैं हूं अकेली, आनन्द उर न समावै॥
बार-बार छवि देखि-देखि कैं, उमगि नैंन भरि आवै।
भोरी भुक्ति-मुक्ति नहिं चाहत, छिन इक वह सुख पावै॥