जहँ राजत नवल निकुञ्जन प्यारी।
जहँ पग देत महावर मोहन, जहँ हित बाँधत बैनि सँभारी॥
ललिता ललित विशाखा राजत, सेवा करत सखी सुख भारी।
जहँ की महिमा वेद न जानत, शिव अज रहत बिचारी॥
जहँ मन-बुद्धि-वचन नहिं पहुँचत, व्यापत नहीं काल माया री।
भाग्य हीन पामर भोरी की, किस विधि तहाँ होइ चरचा री॥