॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 160

नवल-निकुञ्ज

बलि-बलि जाऊँ कोकिल तेरी, प्यारी-प्यारी गावौ री।
मेरौ सौ रँग रूप तिहारौ, मोसौं मनहि मिलावौ री॥
यह जु नाम है जीवन मेरौ, प्यासे श्रवण सिरावौ री।
रँग में रँग बढ़ावौ हा-हा, उमगि-उमगि रट लावौ री॥
तन मन प्राण निछावर तेरी, अब न अधिक तरसावौ री।
भोरी हित यह सुधा सजीवन, मेरौ जीय जिवावौ री॥