॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 162

रसिक संग एवं कृपा बल

रसिक संग बिनु प्रेम न होई।
बिनु पद प्रेम भये अलबेली, भब सौं छुटत न कोई॥
कीजै कृपा कृपालु किशोरी, रसिक संग जो पावौं।
जासौं उपजै भाव हिये में, चरण कमल चित लावौं॥
निशि वासर करि तिन की सेवा, तन की तपन मिटये।
तन मन जीवन वारिय भोरी, आंखिन माँहि बसैये॥